Monday, 26 June 2017

" रिश्ता महोब्बत का " ( RISHTA MUHOBAT KA)

ये रिश्ते आम नहीं होते , माना इनके कुछ नाम नहीं होते ,
ये एक ऐसा  सफर है ज़िंदगी का ,जिसमें हासिल  मुक़ाम नहीं होते ।

माना के मिलकर भी नहीं मिल पाती मुहोब्बत इस फरेब  की दुनिया  में ,
क्योंकि   आजकल  सच्ची  मुहब्बत  करने  वाले  तमाम  नहीं होते ।।

कौन समझाए  दुनिया वालों  को की मुहोब्बत मारे नहीं मरती ,
जो मरती तो मंदिरों में आज राधा- श्याम  नहीं होते ।

माना के नहीं  होती  मुहोब्बत पूरी  आज इस कलयुग  में ,
क्योंकि आजकल कहीं  राधा नहीं होती तो कहीं श्याम नहीं होते ।।

ढलती है  मेहखानो में शाम  इश्क़ के मरीज़ों   की ,
वैद्य ,हक़ीम, दवाखानों में इस रोग के आराम नहीं होते।

मिल जाती है सच्ची मोहब्बत जिन्हें यहां "चौहान" ,
वो बस भगवान ही होते हैं यहां इंसान नहीं होते ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां !!













No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...