Saturday, 31 August 2019

"हश्र" (HASHAR)


एक दिन तो हश्र अपना भी ऐसा होना ही था,
इन रास्तों को एक दिन तो अलग होना ही था।।

कहाँ किसे मिला है दुनिया में मुकम्मल जहाँ यहाँ,
महल ख्वाबों का तेरा कभी तो खँडहर होना ही था।।

सब छलावा थे वादे मुहोब्बत के जो किये थे हमनें,
एक दिन तो इन्हें भी टूट के चूर होना ही था।।

बुनियाद कैसी भी हो घर टिकते नही सागर किनारे,
कभी तो इन्हें इन लहरों की आगोश में होना ही था।।

वो तब तलक अच्छा था जब तक तुम्हारे कहने पर था,
कभी तो समझ आती उसे भी बेगाना तो होना ही था।।

वो जिस मिट्टी से बचता फिरता रहा दिन रात,
एक दिन तो "चौहान" उस मिट्टी में ख़ाक होना ही था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 28 August 2019

"मत बदलना" ( MAT BADALNA)


निराश मत होना अब ये रास्ते अलग हो भी जाये तो,
उदास मत होना अब मंज़िलें कहीं खो भी जाये तो।।

ये चाँद सितारे सब उसकी रौशनी से रौशन है,
मुस्कुराते रहना ये जगमगाहट कहीं खो भी जाये तो।।

अब जब मिलो उस से तो बस उन लम्हों में जीना,
रोकना मत बहने से गर ख़ुशी में आँखे भर भी आये तो।।

वजूद ना मिटने देना रिश्तों का खुद को मिटा कर भी,
हँसकर क़बूल करना गर इश्क़ में मौत भी मिल जाये तो।।

तेरा अंदाज़ है जो तुझे हज़ारों में सबसे अलग करता है,
खुद को मत बदलना कभी हालात भी बदल जाये तो।।

तेरी सोच पढते है लोग "चौहान" तेरी कविताओं से होकर,
हकीकत ही लिखना जमाना बगावत पर भी उतर जाए तो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 26 August 2019

"वक़्त से सौदा" (WAQT SE SAUDA)



उम्र कम थी और मजबूरियाँ बड़ी,
मुझे वक़्त से सौदा करना ना आया।।

ज़िंदगी माँगी वो मौत बेचकर चला गया,
मुझे हालातों से कभी लड़ना ना आया।।

जिस जीत का जश्न मना रहा था हार थी मेरी,
फर्क कभी मुझे बुरे से बुरे में करना ना आया।।

सफर भी आसान था मेरी मंज़िल भी करीब थी,
किनारे तक आते आते डूब गया तैरना ना आया।।

हर किसी को अपना मान बैठता था कमी थी मेरी,
धोखे मिलते रहे अपनो से कभी धोखा करना ना आया।।

बड़े अच्छे होते है वो लोग जो मरने में बहस नही करते,
ज़िंदगी तिल-तिल मरती रही मुझे मरना भी ना आया।।

कोशिशें करता रहा "चौहान" ताह उम्र हालात लिखने की,
हकीकत में कभी दर्द लफ़्ज़ों में बयां करना ही ना आया।।

लोगों को ना जाने कौन सा अपनापन दिखता रहा नज़्मों में मेरी,
वो महसूस करते रहे मुझे कभी "चौहान" ठीक से पढ़ना भी ना आया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Sunday, 25 August 2019

"पछताओगे" (PACHTAOGE)


मुझसे बिछड़ कर अब कहाँ जाओगे,
अब किसे तुम अपना हमराज़ बनाओगे।।

क्या वही किस्सा पेश करोगे उसके सामने,
या कोई नई कहानी सोची है जो उसे सुनाओगे।।

दो आँसू ज़्यादा बहा देना गर वो गौर ना करे,
हाथों में नमक है जमाने के ज़ख़्म किसे दिखाओगे।।

बड़ा मुहोब्बत में खुदा बनाकर पूजा है तूने मुझे,
अब और कितने पत्थरो को तुम खुदा बनाओगे।।

बड़ी नमाज़े पढ़ी थी तुमने मुझे पाने की खातिर,
अब किसकी चाहत में मस्ज़िद में सिर झुकाओगे।।

माना मैं दरख़्त था जो हिज़रत ना कर सका,
तुम तो परिंद हो पल में वतन बदल जाओगे।।

पर याद रख वो खुला आज़ाद ज़रूर है मगर,
जब पँख थक जाएंगे तो दरख़्त पर ही आओगे।।

हर मोड़ पर तुम्हे मिलेंगे ऐसा तो ज़रूरी नही,
एक रोज़ तुम लौट कर आओगे पर हमें नही पाओगे।।

एक कब्र होगी और मेरी लिखी कुछ किताबें "चौहान",
पछताओगे ,हर लफ्ज़ में जब हमे लिखा पाओगे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 22 August 2019

"राधे मोहन" (RADHE MOHAN)


टूटी बांसुरी की कहानी कौन जानता है,
मुहोब्बत क्या है बस वही पहचानता है,
कृष्ण , मोहन, कान्हा , ना जाने कितने नाम है ,
महोब्बत में तो हर कोई उसे राधे के नाम से जानता है।।
बाते नही की दिल लुभाने वाली , दिल बहलाने वाली,
हाँ माना लाखों गोपियाँ थी उसकी दर्श की दीवानी,
खुद को ख़ोया है सिर्फ एक उसकी चाहत के लिए,
राधा के दिल की तड़प तो कान्हा ही पहचानता है,
प्रेम कहानी का सार है आधार है,
क्या है प्रेम ,करते कैसे है,
सही मायने प्यार के तेरे सिवा कौन जानता है,
क्या समझेगा जमाना ताकत मुहोब्बत की "चौहान", आज भी तेरे नाम से पहले नाम राधा का ही आता है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 20 August 2019

"मैं फिर लौट आया" (MAIN FIR LAUT AAYA)


मैं फिर लौट आया हूँ,
खामोशियों को आवाज़ बनाने,
दर्दों को लफ़्ज़ों में पिरोने,
मैं फिर लौट लौट आया हूँ।।

गमों से फिर ये दूरी कैसी,
खुशियों से जी हज़ूरी कैसी,
ज़ख़्मो को नासूर बनाने,
मैं फिर लौट आया हूँ।।

टूटे दिलों का साज़ बन,
बेजुबाँ की आवाज़ बन,
मातम इश्क़ का मनाने,
मैं फिर लौट आया हूँ।।

अब गिरते अश्क़ों का क्या,
टुटे बिखरे ख़्वाबों का क्या,
अरमानो की चिता जलाने,
मैं फिर लौट आया हूँ।।

भूल गए जो तुम याद पुरानी,
कुछ किस्से कोई कहानी,
अब सब तुमको याद दिलाने,
मैं फिर लौट आया हूँ।।

अब लिखा रुला देगा तुम्हे,
हर एक लफ्ज़ तड़पा देगा तुम्हे,
मेरी कलम को दिल की ज़ुबाँ बनाने,
"चौहान", मैं फिर लौट आया हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 17 August 2019

"तलाश-2" (TALASH -2)


मैं एक अजनबी चहरे की तलाश में रहता हूँ,
कभी कहीं मिल जाये वो इसी आस में रहता हूँ।।

दर्पण तक जिसके रूप को निहारना चाहता है,
चहरे के नूर से आफताब भी चमक जाता है।।

वो जो कल्पनाओं से परे है अप्सराओं से आगे,
वो जिसे बनाने का नाज़ खुदा खुद उठाता है।।

वो जिसे देख मौसम भी अपना मिज़ाज बदल लेता है,
वो जिसके छूने से हर बाग, गुलिस्तां महक जाता है।।

वो जिसे मैं अक्सर अपने ख्वाबों की हक़ीक़त कहता हूँ,
वो जिसके ज़िक्र से मेरी नज़्म का अंदाज़ बदल जाता है।।

दुवाएँ माँगता हूँ उसे पाने की "चौहान"मंदिर,दरगाहों से,
वो जिसके दिल मे कैद होने की फ़िराक में रहता हूँ।।

मैं एक अजनबी चहरे की तलाश में रहता हूँ,
कभी कहीं मिल जाये वो इसी आस में रहता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 16 August 2019

"ठीक हूँ" (THEEK HUN)


मुझे समुंदर नही बनना मैं दरिया ही ठीक हूँ,
रौशनी तुझ जैसी है तो मैं अँधेरा ही ठीक हूँ।।

क्या फायदा सागर का जो प्यास ही ना बुझा सके,
ज़मी के काम आ जाऊंगा मैं कतरा ही ठीक हूँ।।

वो झूठे फरेबी होकर नसीहत देते है वफ़ा की सच की,
अगर यहाँ अच्छे तुझसे है तो मैं बुरा ही ठीक हूँ।।

मुहोब्बत एक एहसास है इसे बारहां बताया नही जाता,
अगर यकीन ही दिलाना पड़े तो मैं अकेला ही ठीक हूँ।।

मंज़िलें हसीन थी उन रास्तों की जिनपर मैं चला था पर,
किसी का वजूद मिटाना पड़े तो मैं मुसाफ़िर ही ठीक हूँ।।

माफ़ी गलतियों की होती है "चौहान" फ़रेब धोखे की नही,
याराना तुझसा है तो फिर मैं मेरे फ़सानो में ही ठीक हूँ।।

वक़्त पड़े तो याद कर लेना मेरी कही उन बातों को ज़रा,
हाँ तुझे बेगाना कर दिया है और मैं बेगाना ही ठीक हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 14 August 2019

"मेरा देश महान" (MERA DESH MAHAN)


चुप , खामोश, शोर ना करो मेरा देश सो रहा है,
आओ आज तुम्हे नए भारत से मिलवाते है।।

सही है या गलत जो हो रहा है सब जानते है,
नज़र सब आता है बस खुद को अंधा दिखाते है।।

वैसे तो हिंदी भाषा है हमारी, पर शर्मशार है,
रुतबा तो लोग अंग्रेजी बोलकर दिखाते है।।

खेल तो राष्ट्रीय हॉकी है हमारा बरसों से,
पैसा शोहरत तो बस क्रिकेट वाले ही कमाते है।।

अनेकता में एकता का प्रतीक है यूँ तो मगर,
कभी धर्म कभी जात पर अक्सर लड़ जाते है।।

कोई खेतों में तो कोई जंग-ए-मैदान में मर रहा है,
बाँट के लाख रुपये सियासती खेल खेल जाते है।।

धरती को, भारत को माँ कहकर पूजते है लोग यहाँ,
इन्ही सड़को पर बलात्कार ,कत्ल-ए-आम देखे जाते है।।

वो गरीब के घर रोटी भी खा लेता है चुनावी दौर में,
वो अलग बात है खाना बर्तन सब साथ लेकर आते है।।

धर्म के नाम पर यहां इंसान ही नही जानवर भी बाटे जाते है,
गाय हिंदूओं की हो रही है, क्यों बकरे मुसलमानो के धर्म मे आते है।।

बात कानून की करो तो ये भी बस सब्र आज़माते है,
लोग कब्र तक पहुच जाते है पर फैसले ना हो पाते है।।

एक जगह थी जहाँ सिर झुका कर सुकून मिलता था,
वहाँ भी किस्से बाबरी मस्जिद और राम मंदिर के पाते है।।

एक गरीब है कि फुटपाथ पर सोकर भी खुश रहता है,
एक लाखों कमा कर भी चैन से ना सो पाता है।।

बड़ा सच दिखता है आजकल खबरों अखबारों में,
कुछ देर करके बहस अपनी जेबें भर के चले जाते है।।

क्या फर्क पड़ता है कोई खबर ज़रूरी दिखाए या ना भी दिखाए तो,
ज़रूरी है आवाम के लिए जो भारत की हार के कारण पूछे जाते है।।

कुर्बानियाँ कौन याद रखता है "चौहान" बलिदान देश की ख़ातिर,
यहाँ तो किताबो में आज भी चरखे से देश आजाद करवाये जाते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 10 August 2019

"अब ज़िंदगी" (AB ZINDAGI)


अब ज़िंदगी निगाहों में खटक रही है,
मंज़िलें खुद इन रास्तों में भटक रही है।।

किस उम्मीद में है ना जाने ये बेले मुझसे,
जो मुझ जैसे सूखे पेड़ से आज भी लिपट रही है।।

खुशियां है कि इस दरवाजे में आने को राजी नही,
गम की दीवारें है जो हर रोज़ हर वक़्त बढ़ रही है।।

नाकामियां ही तो नज़र आ रही है सबको मेरी,
मेरी मेहनत के लहु से सबकी नजर हट रही है।।

अभी तो पनपा भी नही ज़मी से पूरी तरहा,
मुझे उखाड़ फैकने की साज़िशें अभी से चल रही है।।

अब तो साँसों सा ज़रूरी हो गया है लिखना मेरे लिए,
"चौहान" सँजो कर रख दुआ-बदुआ जो भी मिल रही है।।

सब लाश लिए फिर रहे है इस बाजार में अपने ज़मीर की,
इंसानियत है के अब खुदखुशी कर फंदे से लटक रही है ।।

अच्छा किया जो जला कर राख कर दिया उन पन्नो को,
सीख कहाँ आजकल उनमें रोटियां ज़्यादा लिपट रही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 8 August 2019

"बदल गयी" (BADAL GYI)


ना जाने कितनी ही बार ये समझाता हूँ खुद को,
हाँ ये सच है कि बहुत बदल गयी है वो।।

जो एक बार रूठने पर बार बार मानती थी,
आज हक़ीक़त में खुद से संभल गयी है वो।।

जो मेरी छोटी छोटी बातों पर गौर किया करती थी,
आज मेरी बातों को मजाक में बदल गयी है वो।।

कहती तो है आज भी रौशन है मुझपर आफताब की तरह,
पर सच तो ये है कि शाम की तरह ढल गयी है वो।।

कहती है बर्ताव कुछ दिन से ठीक नही है मेरा,
समझना नही चाहती के दूर कितना निकल गयी है वो।।

कोशिश तो बहुत की करीब आने की हमने भी,
साथ तो रही हर रास्तों पर पर मंज़िल बदल गयी वो।।

आज भी कहती है कि हक बस मेरा है उसपर,
आज फिर क्यों  उसके जज़बात ,उसकी ज़ुबाँ बदल गयी है वो।।

अब बस छोड़ दे "चौहान" हर बात को दिल से ना लगा,
समझ जाएगी तो पास भी आएगी क्या हुआ जो दूर निकल गयी वो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 5 August 2019

"वो अलग बात" ( WO ALAG BAAT)


मुहोब्बत कल भी तुझसे थी आज भी तुझसे है,
वो अलग बात है की अब बात नही होती।।

ख़्वाब कल भी तेरे थे ख़्वाब आज भी तेरे है,
वो अलग बात है कि अब रात नही होती।।

प्यास तो आज भी है दिल के सहरा को तेरी,
हाँ अब वो इश्क़ की बरसात नही होती।।

उसी तड़प बेकरारी से इंतज़ार है आज भी तेरा,
हाँ सच है अब हमारी तुम्हारी मुलाकात नही होती।।

आज भी पहरों गुज़ार देता हूँ बात तेरी तस्वीरों से करके,
दुख है के कभी मेरे हाल पर तेरी आँखे क्यों नही रोती।।

बहुत कहानियाँ लिखी है पढ़ी है इश्क़ की यूँ तो मैंने,
जो मेरी अपनी सी लगे ऐसी किसी मे बात नही होती।।

तेरी ख्वाईशें,आरज़ू ,हसरत, जुस्तजू बहुत की है मैंने,
कुछ कमी तो अब भी है जो खुदा की करामात नही होती।।

डर लगता है इस कहानी का अंजाम अधूरा ना रहे "चौहान",
जिस्म मर जाते है इंतज़ार में आँखे नाउम्मीद होकर बंद नही होती।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 3 August 2019

"एक बार फिर" (EK BAAR FIR)


ज़ख़्मो पे एक ओर ज़ख़्म खाने का सोच रहे है,
आज एक बार फिर दिल लगाने का सोच रहे है।।

बड़ी मुश्किलों से संभाला था खुद को हमनें,
एक बार फिर वही ठोकर खाने का सोच रहे है।।

बिखर गए थे एक बार फिर हम काँच की तरह,
आज फिर टूट के बिखर जाने का सोच रहे है।।

यादें किसी कि अब तलक लाश बनकर तैर रही है,
आज फिर किसी की याद में डूब जाने का सोच रहे है।।

नींदों से तो आँखो की ना जाने कबकी अनबन है,
अब एक बार फिर नींदों से लड़ जाने का सोच रहे है।।

ये चाँद सितारे दोस्त है और गवाह भी मेरे हाल के,
आज फिर इनको राज़दार बनाने का सोच रहे है।।

मेरी कलम से निकले अल्फ़ाज़ बयाँ करते है कोई कहानी,
"चौहान" एक और नई कहानी लिखने का सोच रहे है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 1 August 2019

"बेटी का हक" (BETI KA HAK)


आओ सुनाऊँ एक कहानी जो सदियों से देखते आये हो,
सोच है जमाने की सब उनको रिवाज़ बनाते आये हो।।

आज तुम्हे मैं शायद गलत भी लगूँ, पर बाते सच की है,
कहने को ही समान है सब बातें आज यहाँ हक की है।।

बेटी कहाँ अपनी है एक दिन तो पराये घर जाना है,
जो भी करना वही करना जीवन वही तो तुझे बिताना है।।

सबसे बड़ी चिंता है कि तुमपर ये लोग क्या बोलेंगे,
आगे बस वही करना है जो ससुराल वाले बोलेंगे।।

पढ़ना लिखना काम नौकरी सब उसका बेकार गया,
घर की इज़्ज़त बता कर उसको करने से इंकार किया।।

कुछ ख़्वाब अधूरे मायके में जो ससुराल में पूरे करने थे,
कहाँ खबर थी उसको के सब मिट्टी में ही मिलने थे।।

"चौहान" समाज ये सोच का दोगलापन कब छोड़ेगा,
कब बेटे और बेटी को फिर वो एक तराजू तोलेगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...