हार गया हार के भी क्या हारा ,
इश्क़ था जान तो वैसे भी जानी थी ।
बात जज़्बातों की थी ज़रूरतों की नहीं ,
तेरी खुशियों की ज़िद्द तो हमने भी ठानी थी ।।
रूह तो कब की मिल गयी थी तुझसे ,
एक ज़िंदगी ही थी जो बेगानी थी ।
क्या लिखना और क्या सुनाना हाल-ए-दिल उनको "चौहान",
जिनके लिए महोब्बत बस चंद लफ़्ज़ों की कहानी थी ।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां
इश्क़ था जान तो वैसे भी जानी थी ।
बात जज़्बातों की थी ज़रूरतों की नहीं ,
तेरी खुशियों की ज़िद्द तो हमने भी ठानी थी ।।
रूह तो कब की मिल गयी थी तुझसे ,
एक ज़िंदगी ही थी जो बेगानी थी ।
क्या लिखना और क्या सुनाना हाल-ए-दिल उनको "चौहान",
जिनके लिए महोब्बत बस चंद लफ़्ज़ों की कहानी थी ।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां
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