Tuesday, 27 June 2017

" काफ़ी है " ( KAFI HAI)

दर्द-ए-दिल की दवा मिले ना मिले,
दर्द दिल को मिले तो काफी है ।

बात अगर वो करें या ना करें ,
होंठ उनके हिल जाएं तो काफी है ।।

आशिक़ी उनकी आँखों से बहे या ना बहे ,
हमें देख नज़रें भी झुक जाए तो काफी है ।

इज़हार-ए-मुहोब्बत वो हमसे करे या ना करें ,
ऐतबार सिर्फ हम हीं पर करे तो काफी है ।।

 माना हमसे मिलने कि उनकी हसरत हो या ना हो ,
खवाबों में ही मिलने आ जाएँ तो काफी है ।

हमें अपने दिल में बसाये या न बसाएं ,
हमारे दिल में अपना घर बना ले तो काफी है ।।

वो हमें हरपल याद करें या न करें ,
उनके नाम की हिज़कियाँ ही आ जाए तो काफी है ।

सुनहरी शाम हमारे नाम करे या न करें ,
यादों भरी रात दे जाए तो काफी है ।।

कोई गम नहीं तुम ज़िंदगी के सफर में संग चलो ना चलो ,
ना मरने वाली आरज़ू बन "चौहान" के दिल में बस जाओ काफी है ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ 

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