इस साल कोशिशें नाकाम नही होगी,
महफिलें भी फिर आम नही होंगी,
नही रखेंगे वास्ता तुझसे तेरी यादों से,
इस साल तेरी यादों में ढलती शाम नही होगी।।
सावन तो आएगा पर ये आंखें ना बरसेंगी,
तुझे देखने को अब कभी ना तरसेंगी,
खुशियाँ भी देंगी दस्तक़ चौंखट पर मेरी,
इस साल मंज़िलें गुमनाम नही होंगी।।
ना लिखेंगे फ़साने मुहोब्बत के हम,
ना बनेंगे नासूर अब दिल के ज़ख्म,
अब फ़र्क नही पड़ेगा किसी की बातों का,
अब दिल की बस्ती किसी की गुलाम नही होंगी।।
जो पाया वो कुछ काम ही ना आया,
जो छोड़ गया वो कभी लौट ही ना पाया,
छुपके से आ ही जाऊंगा करीब तुझ तक,
हसरतें तुझे पाने की अब शरेआम नही होंगी।।
तन्हाइयों से भी अपना सारा नाता तोड़ लेंगे,
खुद का खुद से ऐसा रिश्ता हम जोड़ लेंगे,
लिखना छोड़ देगा अब ज़िक्र तेरा "चौहान",
इस साल ये कविताएं भी बेनाम नहीं होंगी।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।








