रात भर तेरे दर्द से लिपट कर रोता रहा ,
तेरी यादों में खो के अश्क़ों की माला पिरोता रहा ,
हसरतें भी ना रही दिल की शिव एक तेरी चाहत के,
इन् आँखों में बस वही खवाब बार बार संजोता रहा ..
कहाँ मंज़िल होती उन रास्तों की तुम ,
एक वक़्त-ए-अंदाज़ था जो गुज़र गया ,
बस यही सोच खुद को तेरे गम में डुबोता रहा ...
छू कर कभी ठहर जाता जो तेरे लबों पर हंसी बनकर ,
एक एक कतरा जो बहा तेरी मुस्कानों में छुपकर ,
न गुजरने वाला वो वक़्त "चौहान" तेरी यादों में खोता रहा ,
रात भर तेरे दर्द से लिपट कर रोता रहा ..
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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