तू वैसा तो नही जैसा ये सब दिखाते है,
तेरे नाम से भी क्यों तुझे ना जान पाते है।।
नील कंठ ,विषधारी, भी तो तेरा नाम है,
प्रशाद बता ये ज़हर क्यों नही पीकर दिखाते है।।
विष धारण किया था तूने सृष्टि के बचाव को,
आजकल तेरे नाम पर लोग नशे करते जाते है।।
विष धारण किया कंठ में तो देवो ने भाँग दूध पिलाया था,
ये कौनसा विष पी बैठे है जो तेरे नाम पे भाँग,चरस पी जाते है।।
एक तस्वीर देखी थी बचपन मे तेरी चाँद मुकुट,शीश गँगा, हाथ त्रिशूल डमरू वाली,
आजकल तेरी तस्वीरों में हाथ डमरू की जगह चरस चीलम दिखाते है।।
तूने तो नही बोला यूँ नशे करके खुद को बर्बाद करना,
फिर क्यों अपनी अय्यासी के लिए नाम तेरा मढ़ जाते है।।
लायक नही "चौहान" के समझाए जमाने को सही गलत,
हाँ पर तेरा नाम लेकर ये नशे के प्रचार भी ना देखे जाते है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।














