Monday, 29 July 2019

"महादेवा" (MAHADEVA)


तू वैसा तो नही जैसा ये सब दिखाते है,
तेरे नाम से भी क्यों तुझे ना जान पाते है।।

नील कंठ ,विषधारी, भी तो तेरा नाम है,
प्रशाद बता ये ज़हर क्यों नही पीकर दिखाते है।।

विष धारण किया था तूने सृष्टि के बचाव को,
आजकल तेरे नाम पर लोग नशे करते जाते है।।

विष धारण किया कंठ में तो देवो ने भाँग दूध पिलाया था,
ये कौनसा विष पी बैठे है जो तेरे नाम पे भाँग,चरस पी जाते है।।

एक तस्वीर देखी थी बचपन मे तेरी चाँद मुकुट,शीश गँगा, हाथ त्रिशूल डमरू वाली,
आजकल तेरी तस्वीरों में हाथ डमरू की जगह चरस चीलम दिखाते है।।

तूने तो नही बोला यूँ नशे करके खुद को बर्बाद करना,
फिर क्यों अपनी अय्यासी के लिए नाम तेरा मढ़ जाते है।।

लायक नही "चौहान" के समझाए जमाने को सही गलत,
हाँ पर तेरा नाम लेकर ये नशे के प्रचार भी ना देखे जाते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।






Sunday, 28 July 2019

"वापिस क्यों??" (WAPIS KYU??)



अब उस शहर उस गली में वापिस जाना ही क्यों है,
कैसे है हम क्या हाल है हमारा उसे बताना ही क्यों है।।

अच्छा है अगर वो आज शर्मिंदा है अपने किये पर,
जो एक बार परख लिया उसे बार बार आज़माना क्यों है।।

लाख रोका था जिसे जाने से दूर हमने एक वक्त पर,
आज वो लौट भी आये तो भी गले से लगाना क्यों है।।

ज़रूरी तो नही रास्ते का हर पत्थर माथे से लगाया जाए,
पत्थर को पत्थर रहने दो पत्थरों को खुदा बनाना क्यों है।।

जिस चौंखट से खाली हाथ लौट आये हो तुम एक दफा,
कहना फकीरों का उस दहलीज़ पर वापिस जाना क्यों है।।

रिश्ते नाते सब बस एहसास की मिट्टी से बने हुए है,
जहाँ एहसास ही नही उस रिश्ते को फिर बचाना ही क्यों है।।

अब ना उसे तुझे पाने की खुशी ना तुझे उसे खोने का डर,
ऐसे रिश्तों पर फिर ये कीमती वक़्त गवाना ही क्यों है।।

जो तेरा होगा कहीं जाने ही नही देगा दूर खुद से तुझको,
जाते हुए को पीछे से आवाज़ लगा फिर बुलाना ही क्यों है।।

संभाल उसको "चौहान" जो एहमियत रखता हो ज़िंदगी मे,
भरी हुई पुरानी कॉपियों पर नया जिल्द चढ़ाना ही क्यों है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 26 July 2019

"मदारी नही" (MADAARI NHI)



मैं कलाकार हूँ पर किसी, रंगमंच का मदारी नही,
लिखूँगा जज़्बात हज़ार, किसी की तरफदारी नही।।

वो भूखे अनाथ की तस्वीरों को देख खुश होते रहे,
चित्रकार हालात दिखा रहा था तुम्हे चित्रकारी नही।।

तेरा है तो क्या ख्वाईशें उसकी है खुले आसमान में उड़ना,
परिंद जात है पसंद उन्हें भी पिंजरों में गिरफ़्तारी नही।।

प्यार और विश्वास दोनों लाज़मी है किसी रिश्ते के लिए,
परखी इंसानों की जाती है जानवरों की वफ़ादारी नही।।

झुक जाते होंगे माना मज़बूरी हालातो के आगे लोग,
पैसों से ईमान खरीद सकते हो पर ईमानदारी नही।।

कलम असूलों की है मेरी रुक जाएगी पर झुकेगी नही,
आजकल हालात लिखता है "चौहान" इश्कदारी नही।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 23 July 2019

"हार गया" (HAAR GYA)


मैं हक़ीक़त से नही सपनो से हार गया,
मैं गैरो से नही मेरे अपनो से हार गया।।

ये लहरें, तूफ़ान, किनारे तक ले आये मगर,
किनारे पर आकर मैं तिनके से हार गया।।

आज खिलाफत में है जो कल मेरे बनते थे,
जीत जाता पर किसी के इशारे पे हार गया।।

बड़ी उम्मीद थी मुझको कल मंज़िलों से मेरी,
मंज़िलों पर आकर मैं मंज़िलों से हार गया।।

सारा सागर ,दरिया पर कर लिया तूफानों में मगर,
वक़्त की हेर-फेर थी एक कतरे से हार गया।।

सच बोल भी देता मैं तुम्हे पर क्या फ़ायदा था,
भरोसा किया था मैंने जो उसी भरोसे से हार गया।।

लिखने को तो आज भी बहुत कुछ था "चौहान",
मैं लफ्ज़ो से नही अपनी कलम से हार गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 21 July 2019

"बेज़ुबाँ कलम " (BEZUBAA'N KALAM)


बेजुबाँ कलम मेरी ,क्या लिखुँ क्या ना लिखूँ,
हक़ीक़त तुम्हे रास ना आएगी फसाना मुझे,
ये जो घुट घुट के दाम तोड़ रही है आवाज़ मेरी,
क्या इस खामोशी को बयां करते कोई अल्फ़ाज़ लिखुँ।।
मुहोब्बत लिख तो देता पर आजकल करता कौन है,
हालात सौ दफ़ा लिखे पर यहाँ पढ़ता कौन है,
किसे फिक्र है यहाँ किसी के हाल की "चौहान",
दूसरों की ज़ख़्मो की मलहम पट्टी करता कौन है,
सोच लिखुँ, ख़्यालात लिखुँ ,या दिल की बात लिखुँ,
काश कोई अपना मिले जिसके लिए दिन रात लिखुँ।।
आँखो का सागर तो अब सहारा हो गया सुख के,
वो जो लबों पर आकर ठहर गया था एक बूँद पानी लिखूँ।।
अपनी लिखुँ या बेगानी लिखुँ , सोच रहा हूँ कोई एक कहानी लिखुँ,
बिक जाऊँ फिर दुसरो की कही बात लिखूँ,
या टिका रहूं अपने ज़मीर पर जो दिल करता है वो बात लिखूँ,
बेजुबाँ कलम मेरी, क्या लिखूँ क्या ना लिखुँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 20 July 2019

"इश्क़ दिखावा" (ISHQ DIKHAWA)


चंद मीठी बातें, कसमे वादे कर, दिल पर कोई ग़नीमत ना
रखो।।
कल जाना है बेशक आज चले जाओ, पर दिखावे की मुहोब्बत ना रखो ।।

जब लुटा ही ना पाए तुम अपने आप को किसी की खुशियों की ख़ातिर,
तो तुम्हारे नसीब में आएगा कभी शक्श वो ये चाहत ना रखो।।

क्या फायदा गर वक़्त वक़्त पर बदल जाती है ये मुहोब्बत तुम्हारी,
वफ़ाएँ सबसे नसीब होंगी तुम्हे फिर ये हसरत ना रखो।।

'गर करना है तो फिर शौक से कर ज़िक्र उसका हर बात में "चौहान",
इश्क़ में किसी के बिक जाने की कोई कीमत ना रखो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Thursday, 18 July 2019

"गलत कौन??" (GALAT KAUN??)


तू अकेला है तो कोई वजह है,
यूँ अकेले रास्तों पर चलता कौन है।।

तेरी नज़र में मैं गलत मेरी नज़र में तू,
खामियां अपनी यहाँ देखता कौन है।।

मुहोब्बत मुहोब्बत चिल्लाता है हर कोई,
मुहोब्बत की गहराई में उतरता कौन है।।

रिश्तों की अहमियत नही बस आज ज़रूरत है,
बंदिशें है वरना रिश्तों की इज़्ज़त करता कौन है।।

कसमें खा-खा कर निभा रहे है रिश्ते लोग यहाँ,
किसी की खातिर दुनिया में अकेले मरता कौन है।।

बातें सच है पता सबको है अंजाम इस कहानी का,
दिल बहलाते है सच्ची बाते यहाँ करता कौन है।।

तू लाख काले कर कागज़ तेरी इन उम्रदराज बातों से,
नासमझ है "चौहान" तेरी बातों पे गौर करता कौन है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 16 July 2019

"मेरा नाम शायर" (MERA NAAM SHAYAR)


लोग कहते है मुझसे की तेरी कलम बड़ी वफादार है,
तू छुपा ,ये कर देती है बयाँ जो तेरे दिल की पुकार है।।

तू अकेला तो नही इस बाजार में जो लफ्ज़ बेचता है,
शायद मरहम लगता है तभी तेरे लाखों ख़रीददार है।।

तेरी सोच , तेरे ख़्यालात, सब एक तज़ुर्बा सा लगता है,
चाक पर चढ़कर जैसे मिट्टी जैसे लेती कोई आकार है।।

शायद नही पढ़ पाया होगा वो अब तलक तेरे जज़्बात ,
कहाँ हकीकत बयाँ करता आजकल कोई कलाकार है।।

मिट्टी हो मिट्टी में मिल मिट्टी बन जाना है एक दिन,
ज़िंदगी भी दगा करेगी माना आज तेरी राज़दार है।।

शायरों की जात नही"चौहान" , ना उम्र तज़ुर्बेकार है,
फिर ये कैसा कर्म है की तेरा शायरों में नाम शुमार है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 14 July 2019

"कुछ बात" (KUCH BAAT)


अगर जतानी ही पड़ जाए तो मुहोब्बत क्या है,
अगर कोई भी चुका जाए तो फिर क़ीमत क्या है।।

अगर चंद पैसों में बिक जाए तो फिर ईमान क्या है,
हर किसी को दिख जाए तो फिर भगवान क्या है।।

जो नींद के साथ ही टूट जाये फिर वो ख़्वाब क्या है,
जो चंद पानी की बूंदों से बुझ जाए वो आग क्या है।।

जो किसी के दिल तक ना पहुचे वो आवाज़ क्या है,
जो तन ही ना ढाँक पाए वो फिर लिबाज़ क्या है।।

जो ठोकर खाकर भी ना समझे वो सीख क्या है,
जो हर दर से मिल जाये फिर वो भीख क्या है।।

जो तुझ तक सिमट कर रह गया वो ज्ञान क्या है,
जो वक़्त वक़्त पर बदल जाए वो ज़ुबान क्या है।।

जो हालातों के आगे बदल जाए वो असूल क्या है,
जो दर्द में ही ना मिल पाए तो फिर सुकून क्या है।।

हर कोई निभा जाए तो फिर ज़िम्मेदारी क्या है,
इंतज़ार ही ना करना पड़े तो बेकरारी क्या है।।

जिसे देख कुछ याद ना आये वो निशानी क्या है,
जिसे हर कोई समझ जाएं तो कहानी क्या है।।

कोई पहचान गया "चौहान" तेरे दर्द को समेटे अल्फ़ाज़ को,
कोई कह गया कुछ गिर गया तुम्हारी आँखों मे पानी सा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 12 July 2019

"ये कैसा रिवाज़" ( YE KAISA RIWAAZ)


तू किस खुदा ,किस पीर ,किस भगवान, को मनाना चाहता है,
ऐसा क्या है किसी की जान से कीमती जो तू पाना चाहता है।।

गर चढ़ाना है तो शीश अपना या तेरे अपनो का चढा,
फिर देख कैसे तुझे नही मिलता जो तू पाना चाहता है।।

बेज़ुबानों के लहू से क्यों धरती ये आँगन सींच रहा है,
उस जिस्म में भी जान है जिसकी आँखे तू सदा के लिए मीच रहा है।।

वो आवाज़ें दिल की सुन लेता है तेरी श्रद्धा को भांपता है,
कब उसने कहा कि बलि देने से मुँह माँगा फल मिल जाता है।।

अपनी खुशियों की ख़ातिर किसी की हस्ती ना मिटा,
वो चहरे से तेरी नियत तेरे कर्म सब पहचान जाता है।।

खुद को आज के युग का बता ना जाने किन रीति रिवाज़ों को मानते है,
वो किसी के कत्ल से नही , एक नारियल या एक चादर से ही मान जाता है।।

इंसानियत मार कर "चौहान" लोग कैसा अजीब रिवाज़ निभाने चले है,
लाश बनाकर जीव को देखो, पत्थर ,पत्थर को मनाने चले है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 11 July 2019

"तू मेरी दुनिया" (TU MERI DUNIYA)


किस दुनिया में जा रहने लगा है तू,
कोई तेरा अता-पता तो बता,
आकर तुझे जहाँ मिल सकूँ, देख सकूँ,
वो जगह वो रास्ता तो बता,
कैसे सुन पायेगा तू सदा मेरे दिल की,
किस लहज़े से बुलाऊँ वो लहज़ा ही बता,
सारा नीर बहा कर भी एक कतरा संभाल रखा है मैंने,
आजा वापिस इस कतरे को सैलाब ना बना,
देख हर किसी को तो ज़रूरत है आज तेरी,
आलसी ना बन आकर अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा,
दोस्त है तो फिर इस दोस्ती का लिहाज़ भी रख,
खुद मिट्टी होकर "चौहान" पत्थर हमें ना बना,
ढूंढ कर खुश है तू अपनी ये नई मंज़िल तो सुन,
रास्ते बदल अपने उम्र भर का मुसाफ़िर मुझे ना बना।।
वो बंद कमरे में तेरी यादों में खुद को मिटा दूँ,
देख मुझे इतना बुज़दिल, कायर ना बना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 8 July 2019

"आ जाना" ( AA JAANA)


कभी किसी मोड़ पर तुम,
अनजाने से ही मिल जाना।।

इस दिल की बंज़र बस्ती में,
तुम फूल बनकर खिल जाना।।

एक वादा किया था तुमने ,
वो वादा निभाने आ जाना।।

चल माना दूरी ज़रूरी है पर,
शाम ढलने से पहले आ जाना।।

बड़ी तपिश है आज दिल में,
तू घटा बनकर छा जाना।।

मैं हवाओं से तेरा पता पूछुंगा,
तू बारिशों के बहाने आ जाना।।

मेरे इंतज़ार की कोई हद नही,
तू मेरी कब्र पर ही आ जाना।।

नही लिखना अब तुझे किताबों में,
तू खामोशी बनकर छा जाना।।

कैसे तोड़े जाते है ये रिश्ते,
"चौहान" को भी सीखला जा ना।।

सब कहते है तू तारों का होके रह गया,
टूट कर आसमाँ से फिर धरती पे आ जाना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

" लाखों मंज़र” (LAKHOON MANZAR)




लाखों मंज़र देखे इश्क़ के,
अब वो पहले वाली बात कहाँ!!

ना वो मौसम सावन के अब ,
प्यार भरी बरसात कहाँ!!

चले थे जिनको थाम कर ,
अब हाथों में वो हाथ कहाँ!!

बनकर चले थे जो हमसफ़र
अब वो हमारे साथ कहाँ!!

लफ़्ज़ों की खामोशी पढ़ "चौहान",
तेरी कलम की यहाँ औकात है क्या!!

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 5 July 2019

"बेटे" (BETE)


रोते है पर आँसू कभी आँखो में ना लाते है,
हाँ , आजकल बेटे भी घर छोड़ जाते है।।

ना जाने कितनी तकलीफें सहते है अकेले,
माँ बाप को अपनी परेशानी नही बताते है।।

जो मिलता है चुपचाप बना कर खा लेते है ,
हाँ अब वो खाने में नखरे नही दिखाते है।।

याद आती है तो अकेले में रो भी लेते है,
फिर दोस्तों संग मिलकर मन बहलाते है।।

भूखे भी सो जाते है ना जाने कितनी ही बार,
अक्सर माँ के हाथ को रोटी को तरस जाते है।।

मेहमानों की तरह हो गए अपने ही घर मे वो,
सालों मे आते है दो दिन ठहर कर चले जाते है।।

जमाने की नज़र में बड़े सुकून से जीते है,
सच पूछो तो घर के आँगन बहुत याद आते है।।

कैसी भूख है पेट की "चौहान" रिश्तों के मायने नही,
माँ बाप बेटे एक दूसरे को देखने को तरस जाते है।।

घर पराये तो नही बेटियों की तरह मगर "चौहान",
वक़्त का खेल है अपने घर आने को तरस जाते है।।

अक्सर खुद से मैं ये सवाल करता हूँ "चौहान",
पैसा सबकुछ नही तो क्यों बेटे घर छोड़ जाते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 4 July 2019

"मत सोच" ( MAT SOCH)


क्या हालात है तुझे कैसे समझा पाऊँगा,
सब सच कहा रहा हूँ तुझे कैसे यकीन दिलाऊँगा।।

आँसू नही देख सकता एक भी आँखो में तेरी,
तू बता ना फिर क्यों तुझे में जान बूझकर रुलाऊँगा।।

मत सोच के तुझे कभी धोखा दूँगा मैं,
धोखा तो दे दूंगा पर खुद से नज़र कैसे मिलाऊँगा।।

मुहोब्बत में बहुत साल बीत गए है तेरे साथ,
अब एक पल में कैसे किसी और का हो जाऊँगा।।

हाँ नही लिखता तेरे बारे में कलम से अपनी,
ये कहानी अपनी है जमाने को क्यों बताऊँगा।।

इतना आसान नही है बोलना जो तू सोच बैठी है,
के किसी के हुस्न पर मर के तुझसे अलग हो जाऊँगा।।

ये वक़्त की साज़िश है कि आज़मा रहा है मुझे,
तुने समझ लिया मैं तुझे पलभर में अलग हो जाऊँगा।।

समझा नही सकता के तू मेरे लिए क्या है ,
तुझबिन मैं मशानो का जरूर हो जाऊँगा।।

फिर बस यादें ही रह जाएंगी रिश्तों की अपनी,
"चौहान"अब गया तो कभी लौट के ना आ पाऊँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 2 July 2019

तेरी मेरी यारी


तेरी मेरी यारी बहुत खास है,
तू मेरे कल में भी मौजूद था,
तू आज भी मेरे पास है ।।
सुना है कभी मरती नही है ,
मुझे तेरी उस रूह की तलाश है,
क्या हुआ गर एक लिबास छोड़ गया तु,
पहरान बदल के आजा देख,
कितनी ज़िंदगियाँ तुझबिन उदास है,
दूर होता जा रहा हूँ आज कल सब से,
नींदों से भी अब नाता नही कुछ खास है,
नही रखा जाता अब चहरे पर नक़ाब हंसी का,
दिल मे दफ़न कितनी मेरे अरमानों की लाश है,
अतीत में ही कहीं रुक के बैठ गया हूँ मैं,
कलम है कि लिखने को राजी नही "चौहान",
पन्ने काले पड़ रहे है, खाली ज़िन्दगी की किताब है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...