बड़ी ख्वाइशें , बड़ी उम्मीदें थी,
अच्छा भी नही ,बुरा भी नही,
कुछ ले गया तो कुछ दे गया,
ये साल जैसा भी रहा,
कुछ लम्हे क़ीमती दे गया।।
कुछ अपने बेगाने हो गए,
कुछ गैरों ने दिल मे घर कर लिया,
कुछ आँखो से जज़्बात बह गए,
कुछ खुद को ही कह के रह गया,
ये साल ....
सोचा तो बहुत था मगर,
हमें कुछ भी ख़बर ना थी,
जो मुझे पहचान ले भीड़ में,
ऐसी भी नजर ना थी,
कोशिशें लाख की मगर,
एक आईना टूटा ही रह गया,
ये साल ....
नज़राना भी ऐसा मिला ,
जिसकी उम्मीद नही थी,
तुझे भी माँग लेता खुदा से,
शायद मैंने ही जिद्द नही की,
एक हाथ भरा खुशियों से,
एक खाली का खाली ही रह गया,
ये साल...
कभी हाल लिखकर सुनाऊँगा तुझे,
कभी खुद से मिलवाऊँगा तुझे,
फिर कभी मेरे होकर पढ़ना मुझे,
हर लफ्ज़ में नज़र आऊँगा तुझे,
सोचा था इस साल ना लिखूँगा तुझे,
ये ख़्वाब भी अब ख़्वाब ही रह गया,
ये साल....
शिकायत खुदा से भी नही कर सकता,
बिन मांगे दिया उसने मैं मुकर नही सकता,
अब तुझे कहानियों में याद कर लूँगा मैं,
एक दिन "चौहान" खुद मैं कहानी बन जाऊँगा,
मिटा कर सारे जमाने के मोह,
आ देख बनकर तेरा मैं जोगी रह गया,
ये साल जैसा भी रहा,
कुछ लम्हे क़ीमती दे गया।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

















































