Monday, 30 December 2019

"साल के आखिरी पन्ने" ( SAAL KE AAKHIRI PANNE)


बड़ी ख्वाइशें , बड़ी उम्मीदें थी,
अच्छा भी नही ,बुरा भी नही,
कुछ ले गया तो कुछ दे गया,
ये साल जैसा भी रहा,
कुछ लम्हे क़ीमती दे गया।।

कुछ अपने बेगाने हो गए,
कुछ गैरों ने दिल मे घर कर लिया,
कुछ आँखो से जज़्बात बह गए,
कुछ खुद को ही कह के रह गया,
ये साल ....

सोचा तो बहुत था मगर,
हमें कुछ भी ख़बर ना थी,
जो मुझे पहचान ले भीड़ में,
ऐसी भी नजर ना थी,
कोशिशें लाख की मगर,
एक आईना टूटा ही रह गया,
ये साल ....

नज़राना भी ऐसा मिला ,
जिसकी उम्मीद नही थी,
तुझे भी माँग लेता खुदा से,
शायद मैंने ही जिद्द नही की,
एक हाथ भरा खुशियों से,
एक खाली का खाली ही रह गया,
ये साल...

कभी हाल लिखकर सुनाऊँगा तुझे,
कभी खुद से मिलवाऊँगा तुझे,
फिर कभी मेरे होकर पढ़ना मुझे,
हर लफ्ज़ में नज़र आऊँगा तुझे,
सोचा था इस साल ना लिखूँगा तुझे,
ये ख़्वाब भी अब ख़्वाब ही रह गया,
ये साल....

शिकायत खुदा से भी नही कर सकता,
बिन मांगे दिया उसने मैं मुकर नही सकता,
अब तुझे कहानियों में याद कर लूँगा मैं,
एक दिन "चौहान" खुद मैं कहानी बन जाऊँगा,
मिटा कर सारे जमाने के मोह,
आ देख बनकर तेरा मैं जोगी रह गया,
ये साल जैसा भी रहा,
कुछ लम्हे क़ीमती दे गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 28 December 2019

"कल" (KAL)


अब रो लेने दे जी भर के तेरे सीने से लग के,
कल जब कहीं मिले तो फिर बस बात होंगी।।

आज वक़्त भी अपने साथ है भले दो पल का है,
कल कहीं मिले तो मज़बूरियां भी साथ होंगी।।

बस जहन में होंगे वो इश्क़-ए-लम्हात अतीत बनकर,
कल तो बस इन आँखो से जमकर बरसात होंगी।।

एक ख़्वाब टूट गया तो एक मुक्कमल भी हुआ है,
हाँ सच अब भी रात भर तन्हाइयों से बात होंगीं।।

एक कमी रही मुझमें की तुझे एहसास ना करा सका,
ख़ैर तुझे भी तो मेरे जैसी मुहोब्बत किसी के साथ होगी।।

अब तो कुछ लिखने को भी ना रहा ज़िंदगी मे "चौहान",
इश्क़ कब्र तक ले आया आज मिट्टी की मिट्टी से मुलाकात होगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 27 December 2019

"ऐसे शक्श" (AISE SHAKSH)


जाने वाले फिर कहाँ आते है,
बस एक याद बन जाते है,
बड़ा अजीब खेल है खुदा का,
एक ख़्वाब पूरा तो बाकी टूट जाते है,
मैं मौसम की तरह तो नही बदला,
पर हक़ीक़त है ये भी,
पतझड़ में कहाँ पत्ते नए आते है,
सूखे दरख़्त पर एक पत्ता हरा सा मैं,
कहाँ तक अपने वजूद को बचा पाते है,
सब आये इस ज़िंदगी मे एक तेरे सिवा,
गलत कहते है कि इश्क़ करने वाले मिल जाते है,
आज मेरी खामोशियाँ चुभ रही है सबको,
कहते है तेरी बातों के पल बहुत याद आते है,
उसने हर कहीं देखा मुझे एक खुद को छोड़कर,
शायद अनजान था के प्यार करने वाले ,
दिल मे बस जाते है,
कोई जाओ उसे बतला दो इश्क़-ए-कहानी का अंज़ाम,
जो इश्क़ में हार जाते है,
वो आँखो में उदासी, लबों पे ख़ामोशी,
और चहरे पर मुस्कान लिए,
चलती साँसों के साथ "चौहान" खुद को दफ़न कर जाते है।।
रहते है सबके दरमियाँ पर देख ज़रा,
ऐसे शक्श कहाँ लौट कर आते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 25 December 2019

"मुहोब्बत लिखना" ( MUHOBBAT LIKHNA)


अब मैं मुहोब्बत लिखना छोड़ दूँगा,
अब इन बाज़ारो में बिकना छोड़ दूँगा।।

तुझे ही मुबारक हो तेरी ये राहे ये मंज़िले,
अब मैं साये सा तुझे दिखना छोड़ दूँगा।।

अगर पूछा कभी किसी ने मेरी ख़ामोशी का राज़,
कसम खुदा की मैं नाम तुम्हारा लिखना छोड़ दूँगा।।

मैंने कब कहा कि ये सफर यही तक था,
तुमने खुद ही सोच लिया मैं रिश्ता तोड़ दूँगा।।

तुम कहाँ तक सच्चे थे अपने इश्क़-ए-ईमान के,
आमने सामने सवाल कर तेरा गुमाँ भी तोड़ दूँगा।।

बेमतलबी इबादत थी मेरी इसका भी मतलब था,
खुदा ना मिला तो क्या मैं इबादत ही छोड़ दूँगा।।

ये इश्क़-मुश्क, प्यार वफ़ा , सब कुछ तो झूठ फरेब है,
जिस्मों को पाना इश्क़ है तो दिल लगाना ही छोड़ दूँगा।।

हर एक अपने तो खंज़र घोपा है पीठ पर मेेरे,
"चौहान" अब सबसे अपना पेश आना ही छोड़ दूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 23 December 2019

"बेहतर है" (BEHTAR HAI)


कई दफा मंज़िलों को छोड़,
रास्तों का हो जाना बेहतर है।।

जरूरी नहीहर सवालों का जवाब दे,
खामोशी को जवाब बनाना बेहतर है।।

मैं इस मोड़ पर आ गया हूँ इश्क़ में,
अब तो खुद को मिटाना ही बेहतर है।।

कहाँ शायरों की ज़ुबाँ समझ आएंगी ,
अब कलम ना ही उठाना बेहतर है।।

रोज़ खुद की तलाश में निकल पड़ता हूँ,
अपनो से अपना पेश ना आना बेहतर है।।

इंसानियत तो पहले ही दम तोड़ चुकी है,
पत्थरों पर सिर झुकना ही बेहतर है।।

अब सबसे किनारा कर लिया "चौहान",
खुद को हमराज़ खुद का बनाना बेहतर है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 20 December 2019

"तरसेगा" (TARSEGA)


जिस रोज़ खुद को लिखूँगा तुझपर कहर बरसेगा,
सुन कहानी मेरी ये आसमाँ इस ज़मी को तरसेगा।।

तब आना खुदा तू भी सुनने किस्से- कहानी मेरी,
तेरे इन बादलों से पानी नही फिर सैलाब बरसेगा।।

तूने तो बस देखा है मैं तो गुज़रा हूँ उस हाल से,
जब तुझ पर गुज़रेगी तो मौत पाने को तरसेगा।।

आज तेरे क़रीब हूँ तो तुझे कदर नही मेरी मेरे जज़्बात की,
जब चला जाऊँगा दूर तुझसे तो एक झलक को तरसेगा।।

क्या हुआ आज महज़ मजाक लगते है ख़्वाबो के घर मेरे,
जब बनेगें आशियाँ ख्वाबों के तो अंदर आने को तरसेगा।।

यकीन मान पढ़कर रोएगा बहुत किस्से मेरी किताब के,
यकीन मान मेरा फिर अपने अतित में जाने को तरसेगा।।

कुछ बताऊँगा कुछ जला कर राख कर लूंगा संग अपने,
फिर अंज़ाम जानने को "चौहान" ये पूरा जहान तरसेगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 19 December 2019

"रात-ब-रात" (RAAT-B-RAAT)


अब तो रात-ब-रात मुश्किल हो रही है,
नींद आँखों से औझल हो रही है,
अभी कशमकश हो गयी है जिंदगी,
ना क़रीब आ रही है ना दूर हो रही है...
अब तो रात-ब-रात......

एक सैलाब सा उठता है इस दिल मे,
एक दरिया खामोश है इन आँखो में,
ना जाने कैसी रूह से जिस्म की अनबन हो रही है,
एक लौ है जो जल रही है और बुझ रही है...
अब तो रात-ब-रात......

यूँ तो पूरा गुलिस्तां सजा है फूलों से,
बस एक फूल की ही कमी है,
अब होश में ना आऊँ तो ही बेहतर है,
इस ज़िंदगी से तो सच मौत भली है,
अब तो हँसी भी मेरी छुप-छुप कर रो रही है,
अब तो रात-ब-रात......


कुछ समझ आये तो जज़्बात जमाने को बताऊँ,
कुछ नज़र आये तो राह में चलता चला जाऊँ,
अब बस ज़ुबाँ खामोश हो रही है,
धीरे धीरे "चौहान" ये रूह मिट्टी मिट्टी हो रही है,
अब तो रात-ब-रात......


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 17 December 2019

"छोड़ दे" (CHHORD DE)


कोई अश्क़ों से कहदे आँखो में आना छोड़ दे,
दिल को कहदे अब तड़पाना छोड़ दे,
अब और नही सहे जाते ये घाव रिश्तों के ,
कोई मरहम लगा खुदा,नासूर बनाना छोड़ दे,
इन बारिशों को समझाओ रोने का बहाना ना दे,
करीब उसे ला जो मेरा है ,
बेगानों को मेरा बनाना छोड़ दे,
डूब जाने दे गर डुबोना है तो ,
यूँ तिनको का सहारा ना दे,
हर रोज़ खुद की तलाश में निकल पड़ता हूँ,
अब मुझे ख्वाइशों ख़्वाबों का इशारा ना दे,
कोई जाकर उसे कहदे अब याद आना छोड़ दे,
मेरे हाल से बखूबी वाकिफ़ हूँ मैं मगर,
कोई आकर मुझे कहदे "चौहान",
अब मुर्दों को जगाना छोड़ दे,
ये जो दिल मे तू श्मशान लिए फिरता है,
जला कर राख कर ख्वाइशें को दफनाना छोड़ दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 14 December 2019

"जैसा है ठीक है" ( JAISA HAI THEEK HAI)


मैं और तू ,चल!!
जैसा है ठीक है।।

मेरे गम तेरी खुशी,
चल!! जैसा है ठीक है।।

तेरे लबो की हँसी,
मेरी आँखों की नमी,
तू अच्छा सही ,
मैं बुरा ही सही,
चल!! जैसा है ठीक है।।

मेरी हार सही,
तेरी जीत सही,
चल!! जैसा है ठीक है।।

मेंरा झूठ तेरा सच,
कुछ घाव और ये वक़्त,
चल!! जैसा है ठीक है।।

मेरी ज़ुबाँ जैसे ख़िलाफ़त,
तेरी बेअदबी जैसे लियाक़त,
चल!! जैसा है ठीक है।।

अब "चौहान" थोड़ा मगरूर है,
मतलबियों से बहुत दूर है,
जहाँ वफ़ा मिली वहाँ सिर झुकाया,
जहाँ दगा हुआ उन्हें माफ किया,
जो करीब है वो कोहिनूर है,
जो दूर है वो अब बस दूर है।।

वक़्त का लिखा सामने सबके आएगा,
क्या खोया क्या पाया वक़्त बताएगा,
उम्रभर के रास्ते है तो क्या हुआ,
मंज़िल कौनसा हमसे दूर है।।

ये वक़्त, ये मौसम,
ये रास्ते , ये मंज़िल,
ये तन्हाई, ये रुसवाई,
चल!! जैसा है ठीक है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Friday, 13 December 2019

"ज़िम्मेदारी " (ZIMMEDARI)


ज़िंदगी हर मोड़, हर राह पर सिखाती है,
उम्र से पहले भी हालातों से लड़वाती है,
कोई बचपन कोई जवानी भुल के बैठा है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

कोई दो वक्त की रोटी की तलाश में मज़बूर है,
कोई घर की खातिर अपने ही घर से दूर है,
अपने ही घर मे उन्हें मेहमानों सा बनाती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

माना घर के लोग चार से पांच हो जाते है,
इन्होने अपना घर बसा लिया ये अल्फाज़ कहे जाते है,
हाँ बस राह की कठिनाइयाँ बढ़ जाती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

किसी को माँ बाप के इलाज की फिक्र थी,
किसी को रात के खाने की फिक्र थी,
किसी की आँखें घर जाने को तरस जाती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

कोई उम्र ना थी ये उसके काम करने की,
यूँ हँसती खेलती ज़िंदगी हराम करने की,
"चौहान" की कलम से फिर बगावत नज़र आती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

उसका भी बचपन हँसी खेल में गुज़रता,
यूँ मज़बूरियों के बोझ तले ना दबता,
सोच देख जमाने की फिर कलम उठानी पड़ जाती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 11 December 2019

"माफ कर" (MAAF KAR)


कब तक खुद को जलाऊँगा मैं,
अंधेरो में रौशनी दिखाऊंगा मैं,
ये फलक ,ज़मी मेरा कुछ नही,
तुझे किस जगह ठहराऊंगा मैं,
अब टूटा बिखरा साज़ हूँ मैं,
खामोश सी आवाज़ हूँ मैं,
पहुँचे खुदा तक बादलों को चीर के,
ऐसी सदा कहाँ से लाऊँगा मैं,
क्यों सबका एक सवाल है,
जिसका तू जवाब है,
तुझे गलत मैं कह नही सकता,
जमाने को सच क्या बताऊंगा मैं,
सूखे हुए दरख़्त सा मैं,
अब किसके काम आऊँगा मैं,
तेरी छुवन से हरा हो जाता,
अब तो बस जलाया ही जाऊँगा मैं,
रोक लेने दे जज़्बात अपने,
कहीं लिख ना दूँ हालात अपने,
हर किस्से में तो ज़िक्र तेरा है मगर,
कब तक "मेरी कलम-दिल की ज़ुबाँ" बनाऊँगा मैं,
बात तुझ तक कभी आने नही दूँगा,
तेरे चेहरे पर उदासी छाने नही दूँगा,
अब लिखना लिखाना बहुत हुआ,
सब राज़ अपने साथ दफन कर जाऊँगा मैं,
चल अब तो इंसाफ कर,
सब गिले-शिकवे माफ कर,
अब हाल-ए-दिल लिखा नही जाता,
बस,अब "चौहान" को माफ कर।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 9 December 2019

"तुझे याद" (TUJHE YAAD)


क्या ये उम्र युहीं गुज़र जाएगी,
क्या ये ख्वाइशें यूँही मर जाएंगी,
तुझे याद करते करते,
तेरी राह देखते देखते।।

दिल के पलते उन अरमानों का क्या,
आंखों के सागर में तूफानों का क्या,
क्या ये एक दिन सहरा बन जाएंगी,
तुझे याद करते करते,
तेरी राह देखते देखते।।

उन टूटे रिश्ते नातों का क्या,
उन बिखरे काँच से वादों का क्या,
क्या लाश बन मुझमे दफन हो जाएंगे,
तुझे याद करते करते,
तेरी राह देखते देखते।।

अब लिखना लिखाना भी क्या,
अब सुनना सुनाना भी क्या,
"चौहान" एक रोज़ कलम भी मर जाएगी,
तुझे याद करते करते,
तेरी राह देखते देखते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Thursday, 5 December 2019

"अब बस और नही" (AB BAS AUR NHI)


बहुत उठा ली आवाज़े अब खुद हाथों में हथियार उठाओ,
किलकारियां चिल्लाहटों में बदले उस से पहले संभल जाओ।।

अब आवाज नही अस्त्र उठाओ,
अपनी अस्मत खुद बचाओ ,
बहुत हो गया लोक-लिहाज़ ,
अब दुर्गा से चण्डी बन जाओ।।


इन दीवारों में तू ही क्यूँ रहेगी,
ये दर्द सारे तू ही क्यूँ सहेगी,
नज़रे तो बुरी जमाने की है ,
फिर घूंघट में तू क्यूँ रहेगी,
शाम से पहले घर क्यों आना होगा,
बाहर निकलते तुझे क्यों घबराना होगा,
क्यूँ तू किसी और पर निर्भर रहेगी,
अपनी आवाज़ दबा कर तू चुप क्यूँ रहेगी,
कब तक ज़िम्मेदारी के बोझ में दबती रहेगी,
कब तक संस्कारों के लिहाज में पिसती रहेगी,
आत्मरक्षा में खुद हथियार उठाने होंगे तुझे,
काली बन कब तक तू गौरी बनकर रहेगी,
कर सँहार जो हाथ उठाये अस्मत पर तेरी,
फिर लाल रक्त से इंसानियत की ज़मी हरी होगी,
छोड़ अब बात बात पर अश्क़ बहाना,
अब तुझे खुद आगे आना होगा,
हैवानियत में जन्मे हैवानों का फिर,
बन चण्डी रक्त बहाना होगा,
अपने अस्तित्व का परचम तुझे,
खुद लहराना होगा,
जो बरसों से झुकी रही,
उन नज़रो को उठाना होगा,
जो कभी दहक ना पाया,
वो ज्वालामुखी सुलगाना होगा,
हाँ ज़िम्मेदार है हम इन हालातों के,
कहीं ना कहीं गुनहगार भी है,
यूँ सड़को पर उतर के कुछ ना होगा,
यूँ घर मे छुपकर कुछ ना होगा,
बात मान "चौहान" की ,
तेरी आबरू अस्मत की खातिर,
शस्त्र तुझे खुद उठाना होगा,
कान्हा का इंतजार ना कर,
वो कलयुग कोई और था,
ए द्रोपदी मेरी बात सुन,
यहाँ शस्त्र तुझे खुद चलना होगा,
मोमबत्ती जला कर कुछ ना होगा,
अब तुझे हथियार उठाना होगा,
अब तुझे हथियार चलाना होगा,
अपनी अस्मत आत्मसम्मान को,
तुझे खुद बचाना होगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"सच्ची मुहोब्बत" (SACCHI MOHABBAT)


क्यों कहानियां अधूरी रह जाती है,
क्या इबादत में फिर कमी रह जाती है,
जिनको भी होती है सच्ची मुहोब्बत "चौहान",
क्यों वो एक तरफा होकर रह जाती है।।

तेरी कायनात में इश्क़ का कोई मुकाम नही है,
क्यों मुहोब्बत का हकीकत में कोई नाम नहीं है,
क्यों जिस्मों तक सिमट कर रह गया इश्क़,
क्यों हवस जिस्मों की मुहोब्बत बनकर रह जाती है।।

मैं नही कहता कि मेरी पाक मुहोब्बत है,
राधा कृष्ण के जैसी इश्क़-ए-इबादत है,
पर इतना जरूर है कि करता मुहोब्बत हूँ,
वो नही जो हर किसी हुस्न पर बदल जाती है।।

कोई इश्क़ का भी अपनी कलम से मुकाम लिख,
सच्ची मुहोब्बत का भी कोई नेक अंजाम लिख,
"चौहान" के लिखने से तो सोच भी नही बदलती लोगों की,
सुना है तेरे लिखने से लोगों की तकदीर बदल जाती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 1 December 2019

"रहने दो" ( RAHNE DO)


अब चलो ठीक है जो भी हुआ रहने दो,
आँसू बहाने लाज़मी नही सबके रहने दो।।

कही ना कही गुनहगार हम भी है हालातों के,
मोमबत्तियां बुझी ही ठीक बुझी ही रहने दो।।

दो दिन की गर्मी है बस हालतों का ज़ोर है,
यूँ तैश में ना आओ नरमी ही रहने दो।।

हैवानियत इंसानियत की हदों से आगे है,
खुद को अब राम ना बनाओ रहने दो।।

जिस्म की भूख थी चलो बुझ गयी होगी,
यूँ ज़िंदा तो ना जलाओ चलो रहने दो।।

आज फिर एक बार ख़िलाफ़त में देश उतरा तो क्या,
ये झूठी हमदर्दी ना दिखाओ अब चलो रहने दो।।

होगा कश्मीर आज तुम्हारी सल्तनत में साहब,
इन हालतों पर भी एक नज़र लाओ चलो रहने दो।।

रात, कपड़े, जात, हालात किस का बहाना दोगे,
अगर यही है संस्कृति संस्कार तो चलो रहने दो।।

बहुत हुई बातें अब कुछ तो कानून बनाओ,
हवस की आग में यूँ न झुलसाओ, चलो रहने दो।।

एक नज़र भर देख ले "चौहान" अपने किरदार में,
यूँ लिख कर बातें ना समझाओ ,चलो रहने दो।।

कल भी यही थे देश मे हालात आज भी यही है ,
यूँ चौक पर इज्ज्ज़ते नीलाम ना करवाओ ,चलो रहने दो।।

गर हश्र यही होना है तो फिर खुद ही दफन कर दो,
यूँ किसी का खिलौना ना बनाओ चलो रहने दो।।

नासमझों की टोली में सब समझदार बने बैठे है,
खामोशी रख "चौहान" हमे ना समझाओ, चलो रहने दो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 29 November 2019

"वक़्त" (WAQT)


वक़्त कब किसका हुआ है ,
आज तेरा तो कल मेरा भी आएगा।।

माना रात काली घनी गहरी है मगर,
इस रात के बाद रौशन सवेरा भी आएगा।।

आज किसी और का नाम है तो क्या,
कल ज़ुबाँ पर लोगों के नाम मेरा भी आएगा।।

इस सफर में छाव देखकर रुकना मत,
मंज़िलों पर फिर नाम मेरा भी आएगा।।

जो छोड़ गए बीच राह उन्हें याद मत कर,
जब होश आएगा तो ख़्याल मेरा भी आएगा।।

जो जैसा लिख रहा है लिखने दे गौर ना कर,
एक दिन लिखा सामने सबके फिर मेरा भी आएगा।।

आज लिख रहा है तू बनके ज़ुबाँ आवाम-ए-दिल की ,
किसी कहानी में तो "चौहान" ज़िक्र मेरा भी आएगा।।

किस बात की हैरत और किस बात की फिक्र "चौहान",
सब उनकी नज़र में है, उसकी तहरीर से सबके लिए लिखा जाएगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 27 November 2019

"कसूर" ( KASOOR)


एक रात की कहानी थी इश्क़ की बरसातें थी,
एक मुरझाए फूल को मैंने सूखने से बचा लिया।।

सुरूर था मुहोब्बत का ,इश्क़ के नशे में चूर थे हम,
एक दरिया शराब का मैंने आँखो से बहा दिया।।

ख्वाइशें थी दिल की उसकी सोहबत में रहना,
इस आरज़ू में कितने ग़मो को सीने से लगा लिया।।

क्या कुछ तो नही किया मैंने एक उसकी ख़ातिर,
उसके ख़्वाबों के ख़ातिर खुद के ख़्वाबों को जला दिया।।

हर पत्थर को पत्थर समझ ठोकर नही मारी"चौहान",
कसूर इतना था खुदा समझ माथे से लगा लिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 26 November 2019

"कहानी इश्क़ की" (KAHANI ISHQ KI)


थी मुहोब्बत की कहानी इतनी "चौहान",
कोई हमें ना मिला हम किसी के हो गए।।

रात बहुत थी तन्हा मुसाफ़िर थे हम,
चाँद ना मिला हम जुगनुओं के हो गए।।

बड़ी ख़्वाईश थी उस गुलिस्तां में समाने की,
फूल तो ना मिले हम खुशबुओं के हो गए।।

बड़े बेसबर थे कोई हमारे हम किसी के लिए,
कोई चौंखट पर आया मेरे हम उसी के हो गए।।

बड़ी चाहत थी मंज़िलों को पाने की हमें,
साथ चले नही वो हम किसी की मंज़िल हो गए।।

अब क्या लिखुँ इस कहानी का अंज़ाम "चौहान",
किसी की कहानी पुरी करके हम अधूरे हो गए।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 23 November 2019

"रात भर" (RAAT BHAR)



तुझे किस बात का गम है,
क्यों तू भी मुझसा हो रहा,
मेरी तो गुज़रती थी रातें रो रोकर,
तू किस गम में रात भर रो रहा है।।

क्यों अपनी हदों को तोड़ आया है,
किसके ख़ातिर सब छोड़ आया है,
खुद से ही तोड़कर नाता आज तू,
बता मुझे किसका हो रहा है।।

तेरी नज़रों में वो खुदा सही,
उसकी नज़रों में इश्क़ गुनाह सही,
जिसे तू सुनना चाहता है हाल दिल का,
देख वो तो चैन से सो रहा है।।

इस मुहोब्बत के दलदल से कैसे निकल पायेगा,
क्या हुआ इश्क़ आफ़ताब है शाम होते ढल जाएगा,
देखा करेगा जोड़ कर खुद से कहानियाँ मेरी,
पूछेगा "चौहान" बरसो पहले लिखा अब कैसे हो रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 22 November 2019

"नादानी" (NADANI)


जानता हूँ तू चुप है ख़ामोश है,
कुछ खास नही कहती,
हाँ सच ये भी नही की,
मैं हर वक़्त सच लिखता हूँ,
पर तु मेरे अच्छे बुरे हर वक़्त में शामिल है,
किसे खबर है मैं क्यों और क्या लिखता हूँ,
कभी तुझे आसमाँ की परी बताता हूँ,
कभी खुदा तो कभी पत्थर,
पर एक बात है जो तू गौर नही करती,
के हर लफ्ज़ में मैं तुझे अपना लिखता हूँ,
तेरी मुहोब्बत का फ़क़ीर हूँ,
लकीरों का मोहताज़ नही,
हाँ, सच है अपनी तहरीर से ,
खुद अपनी तकदीर लिखता हूँ,
लगाम लफ़्ज़ों पर कैसे लगाऊँ,
जज़्बात है मेरे दिल के ,
माना चुभती है तुझे बाते मेरी,
पर ज़रा सोच क्यों अपने दिल को दुखा,
मैं ये ख़्यालात लिखता हूँ,
तू मुहोब्बत है मेरी,
गिला, शिकवा, शिकायत, मुहोब्बत, चाहत,
सब तुझसे ही होंगी,
कैसे कहुँ तेरे बिन ये कहानी अभी बाकी है,
माना लिखता है "चौहान" हाल-ए-दिल,
सच है पर अच्छा है थोड़ी नादानी अभी बाकी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 20 November 2019

"तेरे पास" ( TERE PAAS)


पूछता हूँ रोज़ सवाल एक इस दिल से,
टूट कर भी छूटती आस क्यों नही,
क्यों बार बार टूट रहा है तू इस कदर,
क्यों दिल के सहरा को दरिया की प्यास नही,
क्यों नाउम्मीद नही होता जब की,
ये तू भी जानता है उसके आने की कोई आस नही,
क्यों इन ज़ख़्मो को नासूर बनाने पर तुला है,
तू खुद मरहम है इनका मरहम किसी के पास नही,
जानता है इस रास्ते का मुक़ाम मौत है,
वो हमसफर बनकर तेरे साथ नही,
तू जज़्बात बता रहा था ,
उसे कहानियां लग रही थी,
ऐसे पत्थरों को क्या पूजना,
जिसे तेरे दर्द का एहसास नही,
तूने लिख लिख किताबें काली कर दी,
लाश ही तो है तेरे अल्फ़ाज़,
हिलाकर देख इनमें अब बाकी साँस नही,
इंतज़ार की भी हद होती है "चौहान",
अलग नही हो पाती मिट्टी में मिली राख कही ,
हक़ीक़त तू भी जानता है तेरा दिल भी,
गर है जवाब तो फिर बता मुझे,
वो तेरा है तो फिर तेरे पास क्यों नही??
तेरे पास क्यों नहीं??


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 18 November 2019

"वजह" (WAJAH)



कहाँ औक़ात थी कुछ लिखने की,
कुछ अपनो ने ,कुछ गैरों ने,
कुछ जमाने ने अपना रंग दिखा दिया।।

कोई होता तो शिकायत भी कर लेते,
कोई था नही तो ग़मो को सीने से लगा लिया।।

रौनकें लग जाती थी वहाँ जहाँ होता था मैं,
कुछ वजह थी जो खुद को श्मशान बना लिया।।

एक अँधेरी रात के सिवा अब बाकी भी क्या था,
तन्हाई ही तन्हाई थी चाँद तारों को दोस्त बना लिया।।

कभी किसी को आज़मा कर नही देखा,
मुझे देखो सारे ज़माने ने आज़मा लिया।।

बात इबादत की ही तो थी मुहोब्बत में ,
मैंने तो पत्थरों पर भी सिर झुका लिया।।

ज़िंदगी के इस जुए के खेल में जब सब हार गया,
आखिर में दाव मैंने खुद को ही लगा दिया।।

कोई समझना चाहता तो समझता भी आखिर,
क्यों किसी एक के लिए राकिब जमाना बना लिया।।

तेरी बंदानवाज़ी से भी खुश हूँ मौला,
तेरा दिया मैंने हँसकर माथे से लगा लिया।।

कुछ हालातों ने कुछ जज़्बातों ने जँझोड़ दिया,
यही वजह है "चौहान" ने कलम को सीने से लगा लिया।।

बड़ी नुमाइशें लगती है यहाँ मुहोब्बत में जज़्बातों की,
देखा ना गया तो खुद को जिंदा दफना लिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 15 November 2019

"मैं ऐसा था नही" ( MAIN AISA THA NHI)


पत्ते सूखे नही थे ,टहनी ,जड़े भी मज़बूत थी,
मैं गिरा नही मुझे वक़्त से पहले काटा गया है।।

कोई तराजू तोल नही था मेरे लिए रिश्तों का,
मुझे रिश्तों का वास्ता दे रिश्तों में बाँटा गया है।।

ऐसा नही है के बस काँटे ही रहे हो दामन में मेरे,
साज़िश थी फूलों को छोड़ काटों को छाँटा गया है।।

अब कहाँ किससे फरियाद करूँ बेगुनाही की अपनी,
मुझे हर चौंखट से फटकारा , दुत्कारा, डाँटा गया है।।

दिखा कर रौशनी मुझे पल भर को बेहिसाब "चौहान",
अंधेरे के इस काले जाल में मेरी रूह को आँटा गया है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 14 November 2019

"हैरत" ( HAIRAT)


इन रास्तों पर इतना आगे आकर भी,
मंज़िल ना मिली तो ,हैरत होगी।।

खुद को तुझमे मिलकर भी तुझे,
कुछ समझाना पड़ा, तो हैरत होगी।।

रिश्ता ये अब तलक विश्वास पर कायम है,
अब ये भी तुझे विश्वास दिलाना पड़ा , तो हैरत होगी।।

एक राह तो बता जहाँ तुझे अकेला छोड़ गया,
रूह को अपना वजूद बताना पड़ा, तो हैरत होगी।।

जब मेरे हर हाल से वाकिफ़ हो तुम,
वहाँ मुझे अपना हाल बताना पडा तो हैरत होगी।।

वो वक़्त और थे की जज़्बात बोलकर बताते थे,
अब बातें भी समझ ना आई तो हैरत होगी।।

चल माना मैंने इबादत मेरी बेगैरत ही सही,
तुझे इबादत भी नज़र ना आई तो "चौहान" हैरत होगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Tuesday, 12 November 2019

"तेरी मेरी कहानी" (TERI MERI KAHANI)


तेरी मेरी कहानी,
क्या यूँ ही रह जायेगी,
आधी, अधूरी ,अनकही ,अनसुनी,
क्या यूँ ही रह जायेगी,
तेरी मेरी कहानी।।

वो ख़्वाब जो मिलकर देखे थे,
सच्चे थे सब झूठे तो नही थे,
क्या माला उन ख्वाबों की,
युहीं टूट के बिखर जाएगी
तेरी मेरी कहानी ,
क्या यूँ ही रह जायेगी।।

हम धरती और आसमाँ तो नही,
जिनका कभी होता मिलन ही नही,
क्या रेल की पटरियों की तरह ,
ज़िंदगी युहीं फ़ासलों में बीत जाएगी,
तेरी मेरी कहानी ,
क्या यूँ ही रह जायेगी।।

माना लिख देता हूँ जज़्बात हज़ार,
तकदीर लिखुँ अपनी मैं खुदा तो नही,
क्या हर कहानियों की तरह "चौहान",
ये कहानी भी किताबों में दफन हो जाएगी,
तेरी मेरी कहानी ,
क्या यूँ ही रह जायेगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 11 November 2019

"EK PAL" (एक पल)


दे उम्र भर का अंधेरा बस एक पल को सवेरा कर दे,
दे ज़िंदगी दो लम्हात की उन लम्हो में तुझे मेरा कर दे।।

नही ख्वाइशें मेरी तेरे आसमाँ के रोशन चाँद सितारों की ,
जुगनुओं से ही मेरे दिल-ए-शहर का दूर अँधेरा कर दे।।

नही ख्वाइशें मुझे खुदा तेरे किसी बड़े तख़्तो-ताज की,
कर सकता है तो उसके दिल-ए-मकाँ में मेरा बसेरा कर दे।।

फिर चाहे तन्हाइयों से वास्ते रख मेरे उम्र भर के लिए,
बस एक बार उसकी महफ़िलों में नाम मेरा कर दे।।

सुना है अधूरे नही रहते वो किस्से जिन्हें तू लिखता है,
मेरी भी मुहोब्बत का किस्सा कलम से तेरी पूरा कर दे।।

मैं नही कहता तू वजूद रख "चौहान" का आफताब की तरह,
उसको रौशनाता रहूँ खुद को जला अंधेरे में मुझको दीया ही करदे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 9 November 2019

"बाकी है" (BAAKI HAI)


एक पल को ठहर जा,
अभी कुछ बात बाकी है।।

नज़र भर देख तो लूँ तुझे,
अभी ये मुलाकात बाकी है।।

ये रात गुज़र जाने दे ज़रा,
अभी मेरे कुछ ख़्वाब बाकी है।।

ज़िंदगी वही है जो तेरे संग है,
अभी जीने कुछ लम्हात बाकी है।।

पत्ते टूटे है तो कल नए भी आएंगे,
अभी दरख्तों पर शाख बाकी है।।

अभी दरिया ही तो बना हूँ कतरे कतरे से,
सागर में मिलने की अभी मेरी प्यास बाकी है।।

किसी बहाने से तू नज़र आता रहे,
बस ऐसे पलों की आस बाकी है।।

रोती रही मेरी कलम रात भर "चौहान" ,
अभी लिखना कुछ हिसाब बाकी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 6 November 2019

"एक क़िस्सा" (EK KISSA)


तेरी कहानी में मेरे नाम एक किस्सा आया,
खुशी थी के तेरे ग़मो में मेरा हिस्सा आया।।

तू नही जानता तू क्या था मेरे लिए,
यही बता दे मुझे खो के तूने क्या पाया।।

तेरे हर एक सवालो के जवाब थे मेरे पास मगर,
कोई अपना होता तो समझ जाता मैं क्यों ना दे पाया।।

बड़ा खुदा बना कर पूजता रहा मैं तुझे,
आँख खुली तो आज सामने पत्थर नज़र आया।।

सब दरख़्त काट पर फेंक दिए उसने,
आज धूप लगी तो पेड़ो की तलाश में नज़र आया।।

मैं क्यों कहुँ के अपने फैसले पर एक नज़र सोच ज़रा,
मैं गलत था जो तेरे पास पलभर को लौट आया।।

ये तो हर सच्ची मुहोब्बत का अंजाम है "चौहान"यहाँ पर,
जो कल फ़साना आज हकीकत कल कागज़ों पर उतर आया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ ।।

Monday, 4 November 2019

"लिखना छोड़ दे" (LIKHNA CHORD DE)


तू "चौहान" अब लिखना छोड़ दे,
ख्वाइशों को ,अरमानो को,
जज़बातों को , हालतों को,
लफ़्ज़ों की डोर में पिरोना छोड़ दे,
बहुत लिखे है फ़साने दिल के,
अब दिल की बातों को बताना छोड़ दे,
क्या फर्क पड़ता है तेरे दमन में दाग है या नही,
जमाने का दामन अपना दिखाना छोड़ दे,
कही सुनी बातों पर यूँ गौर ना किया कर,
लोगों की बातों में अब तू आना छोड़ दे,
तू किन से आस लगाए बैठा है मरहम की,
ज़ख़्मो पर नमक लगते है यहाँ लोग ,
दूसरों को हाल अपना बताना छोड़ दे,
महज़ एक ज़रूरत ही तो बनकर रह गया है,
अब मतलबी लोगों के काम आना छोड़ दे,
वो कहाँ तेरा अपना था जो छोड़ कर चला गया,
तू भी बेगानों से अपना पेश आना छोड़ दे,
मरने के बाद "चौहान" कहाँ कोई अपना है,
तू भी तेरे ख़्वाबों की कब्र पर आना जाना छोड़ दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 2 November 2019

"फैसला" (FAISLA)


बड़ी गहराइयों से जानता हूँ तुझे,
तू यूँ छोड़ जाने वाला तो नही था।।

बड़े गलत फैसले थे जिसके भी थे,
यकिनन ये फैसला तेरा तो नही था।।

किन मजबूरियों में घिरा जो दूर हुआ,
इतना हौसला यार तुझमे तो नही था।।

तेरे मेरे दरमियाँ कहाँ कोई दीवार थी,
सब तो मालूम था हमे छुपा कुछ नही था।।

बिन बताए चला गया तू बेगानों की तरहा,
देख इतना बड़ा रुतबा तो तेरा नही था।।

ना जाने कैसे राह में थक कर बैठ गया तु,
मंज़िल से पहले तो तू रुकने वाला नही था।।

बस एक यही रास्ता रह गया तुझसे बात करने का,
वरना "चौहान" कभी तुझे लिखने वाला तो नही था।।

कोई जड़े ही काट कर ले गया मेरी वरना,
सबको पता था ये दरख़्त गिरने वाला तो नही था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 1 November 2019

"प्यार के रंग" (PYAR KE RANG)


मैं इसे कहुँ तो फिर क्या कहूँ,
मुझे तो ये मुहोब्बत नज़र आती है।।

पर ये भी तो सच है जमाने मे ,
मुहोब्बत तो दोनों तरफ से की जाती है।।

जिसमे फिक्र होती है एक दूजे के हाल की,
मिलने की हर पल बेकरारियाँ तड़पाती है।।

फिर ये कैसी मुहोब्बत है मेरी मेरे खुदा,
उसे मेरी कभी याद तक ना आती है।।

अपना सब कुछ तो लुटा बैठा हूँ उसके लिए,
क्यों उसे मेरी ये मुहोब्बत नज़र ना आती है।।

बड़े रंग देखे है दुनिया मे मुहोब्बत के मैंने,
कोई मिलता है तो कोई मिल के बिछड़ जाता है।।

इसमें ना कोई आस है ना कोई खोने का डर,
बड़ी सच्ची है ये एक तरफा मुहोब्बत कही जाती है।।

ठीक उस फकीर के जैसा हाल है मेरा इश्क़ में,
दिन राते दिदार के लिए इबादत में निकल जाती है।।

मैं भूल भी जाऊँ उसको "चौहान" तो गम नही,
ये कलम है मेरी जो हर लफ्ज़ में उसको लिख जाती है।।

माना इन रास्तों की कोई मंज़िल नही मगर,
हक़ीकत है के सच्चे इश्क़ में उम्मीद नही की जाती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 29 October 2019

"मिले नही" (MILE NHI)


इस बार हम मिले नही तो क्या हुआ,
ये फूल दिलों के खिले नही तो क्या हुआ,
सदियों से यही चलता आ रहा है ,
दो प्यार के राही बिछड़ गए तो क्या हुआ,
इश्क़ जिस्मों का नही रूह का था,
किसने कहा के दूरियों से मिट गया,
माना दूर है आसमाँ ज़मी से,
पर दूरियों में मिलन नज़र आता ज़रूर है,
बिखर जाता है वो बनकर बूंद ,
ज़मी की आगोश में वो आता ज़रूर है,
किसने कहा के हवाओं कि गिरफ्त में दीया बुझ गया,
फड़फड़ाई ज़रूर थी लौ हवाओं की होकर,
मौका देखकर कोई परवाना शमा का होकर जल गया,
अब किसी के मिलने में दीया बुझ भी गया तो क्या हुआ,
मैं हर रोज चाँद में तुझे देखूँगा, छत पर अकेले बैठकर,
तुम भी मेरा अक्ष ढूंढ़ना उस चाँद में कही खोकर,
एक जन्म का नही हर जन्म का नाता है
एक किस्सा नही जो चंद पन्नो में सिमट गया,
कभी दिल छोटा मत करना के हम मिले नही,
फक्र करना के अपने लिए फ़ैसलों पर,
अपनो की खुशी की खातिर,
इश्क़ रास्तों का होकर ही रह गया तो क्या हुआ,
मैं हर पल तेरा ज़िक्र करूँगा ,
"मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" में,
तुम भी हर लफ्ज़ को अपना समझ के पढ़ना,
सुना है सब खत्म हो जाता है पूरा होकर,
अधूरा होकर भी आज इश्क़ हमारा ज़िंदा है,
कहाँ किसी को सपनो का मुक्कमल जहाँ मिलता है,
इबादत सब करते है "चौहान",
कहाँ सबको खुदा मिलता है,
वक़्त की फेर से कहाँ भगवान भी बच पाया है,
इश्क़ राधा से था, दीवानी मीरा थी जिसकी,
किस्मतों ने रुक्मणी का बनाया है,
इश्क़ हक़ीक़त था तो आज भी नज़र आता है,
जिस्म था रुक्मणी के पास पर,
हर कोई तो राधा मोहन ही बुलाता है,
लैला मजनूं, हीर रांझा, सिरी फरहाद,
कहाँ कौन कब मिल पाया है,
ये भी हकीकत मान "चौहान",
इश्क़ ने खुद को हर युग मे दोहराया है,
छोड़ ताने बाने रिश्ते नाते दुनिया के,
आ सबसे परे एक देश चल,
जो इश्क़ ने बसाया है,
इश्क़ रूहानी ज़िंदा रख,
जिस्मो का तू मेल छोड़,
चल ऐसे परदेश चल,
जिस चौखट पर आकर,
रूह से मेल रूह का हो पाया है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 25 October 2019

"शायर बब्बू मान" (SHAYAR BABBU MAAN)



दौर गुज़रा बचपन का जवानी आ गयी,
याद पुरानी एक वो कहानी आ गयी।।

एक गीत सुना बचपन मे "ख़न्ट वाले मान" का,
मैं भी हूँ मुरीद बड़ा , शायर "बब्बू मान"का।।

एक रंग नया हर गीत में नज़र सा आता था,
सुनकर एक दफा बस वो ज़ुबाँ पर चढ़ जाता था।।

"सौण दी झड़ी" से "प्यास" से फिर "मेरा गम",
"ओही चन्न ओही रातां" बस दिल कुर्बान था।।

एक गीत है जो दिल बार बार सुनना ही चाहता है
"दिल तां पागल है" आज भी आँखे नम कर जाता है।।

हश्र का क्या ज़िक्र करूँ वो इश्क़ का पैगाम था,
मैं भी हूँ मुरीद बड़ा शायर "बब्बू मान"का।।

तुझको सुन सुनकर मैंने भी कलम उठाई थी,
लिख कर अपनी पहली नज़्म आँखे ही भर आईं थी।।

माना आज बहुत दूरी है पर उम्मीद अभी बाकी है,
लिखे बहुत किस्से मैंने पर एक फ़साना बाकी है।।

करूँगा ज़िक्र मुलाकात का उस हसीन लम्हात का,
शायर "बब्बू मान" से अभी मिलना "चौहान" का बाकी है।।

एक नज़र बस आपके ख़ातिर पैगाम ये "चौहान" का,
मैं भी हूँ मुरीद बड़ा शायर "बब्बू मान"का।।

बस दिल का ही नही वो जो सच्चा है ज़ुबाँ का,
मैं भी हूँ मुरीद बड़ा शायर "बब्बू मान"का।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 24 October 2019

"क्यों हो रहा है" (KYON HO RHA HAI)


"चौहान" ये क्या और क्यों हो रहा है,
सब कुछ क्यों जुदा जुदा सा हो रहा है,
क्यों दिल टूट रहे है तेरे अपनो के तेरे हाथों,
क्यों तू आज सबसे अलग हो रहा है,
"चौहान" ये क्या और क्यों हो रहा है,
मत बोल , खामोश रह, तेरी ज़ुबाँ अच्छी नही है,
तोड़ दे कलम, जला दे वर्क़े सारे,
जिसे तू लिख के बताए सबको,
ये ज़िन्दगी उतनी अच्छी भी नही है,
क्यों तबाह कर रखा है अपनी खुशियो का शहर,
क्यों इस तन्हाई में तू ख़ाक हो रहा है,
सो जा चैन से ,छोड़ सब जाने दे,
गुज़रा वक़्त बन जा, लोगों को समझ तो आने दे,
यूँ शमशान करके अपने दिल की बस्ती,
क्यों इन ख़्वाईशो,ख़्वाबों के लिए रो रहा है,
सब भर्म ही तो था आख़िर,
सब हक़ीक़त ही तो है जो हो रहा है,
"चौहान" ये क्या और क्यों हो रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 22 October 2019

"मिले क्यूँ??" (MILE KYUN??)


अब जो वापिस उन गलियों में जाऊँ,
ऐसा मेरा उनमे बचा क्या है,
सब कुछ तो खत्म हो गया था बरसों पहले,
तेरे मेरे दरमियाँ अब रहा क्या है,
वो जिस मिट्टी को बार बार टटोल रहे हो तुम,
सिर्फ धूल है तेरा उसमे बचा क्या है,
तेरे जो फैसले थे उनसे ही खुश रह अब,
अब क्या खोया क्या पाया,
इन सब मे वक़्त जाया करने पर मिला क्या है,
आज कब्र पर आकर वो रो भी देगा तो क्या,
अब ऐसे मिलने को रहा है क्या है,
किताबों में लिखे "चौहान" फ़साने मुहोब्बत के अपनी,
ऐसा हसीन पल कोई हुआ ही कहाँ है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 19 October 2019

"इश्क़-ए-सागर"(ISHQ-E-SAGAR)


गहराई में दिल की तुम उतर रही हो,
इश्क़-ए-सागर में मैं डूब रहा हूँ।।

ये जिस कदर मुझे छू कर गुज़री है,
पता तेरा इन हवाओं से मैं पूछ रहा हूँ।।

तू कोई नूर तो नही खुदा का फिर क्यों,
तुझे इन हसीन वादियों में मैं ढूंढ रहा हूँ।।

ये कैसा सुकून मिला है तेरी आगोश में आकर,
धीरे-धीरे इस जहाँ को भी मैं भूल रहा हूँ।।

अब के सावन बरसे तो तुम भी लौट आना,
तेरी याद में अकेला बारिशों में मैं भीग रहा हूँ।।

कोई तो एहसास है तू मेरे इस दिल का "चौहान",
यूँही तो नही तुझे इन कविताओं में ढूंढ रहा हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 18 October 2019

"जज़्बात और नही" (JAZBAAT AUR NHI)


ये कहानी जज़्बात क्या लिखने लगा,
लोग अपना हमराज़ बनाने लगे है।।

पिरो दूँ उनके दर्द को लफ्ज़ो में मैं ,
इस उम्मीद से हर राज़ बताने लगे है।।

बड़े रंग देख रहा हूँ आजकल इश्क़ के,
हैरत है सच्ची मुहोब्बत दफनाने लगे है।।

अय्याशियों को फिर इश्क़ का नाम देते है,
तोहमत फिर एक दूसरे पर लगाने लगे है।।

कोई किसी के इंतज़ार में मर जाता है,
कही दोस्त दोस्ती का फायदा उठाने लगे है।।

भरोसा तोड़ कर भरोसे की उम्मीद करते है,
असली चहरे अब सबके नज़र आने लगे है।।

कसमे वादे तो आज भी वही पुराने है,
बस मुहोब्बत जिस्मो से निभाने लगे है।।

चंद लफ्ज़ क्या लिख बैठा "चौहान",
जामने वाले तुझे शायर बताने लगे है।।

तेरा लिखा कभी तेरे काम तो ना आया,
ख़्यालात तेरे लोगों के काम आने लगे है।।

पूछते है मुझसे फिर इश्क़-ए-कहानी मेरी,
खैर छोड़ो, हम कौन सा बताने लगे है।।

अब ज़िंदगी मिले या फिर मौत इन रास्तों पर,
आज इन हालतों में खुद को आजमाने लगे है।।

कर लिया है गिरफ्त में अश्क़ बहाती कलम को,
हाँ ,"चौहान" अब लफ्ज़ो को जिंदा दफ़नाने लगे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 16 October 2019

"मुहोब्बत की सीख" (MUHOBBAT KI SEEKH)


ये मुहोब्बत की सीख है मेरी ,
ये बात मुझे मुहोब्बत ने सिखाई है,
तुने बातों से लुटे है जिस्म कई,
मैंने मुहोब्बत से इज़्ज़त पाई है,
तू भी सही है और मैं भी गलत नही,
तेरे लिए जिस्मों का खेल है,
मेरे लिए उस खुदा की ख़ुदाई है,
हर किसी को बस एक नज़र से देखना,
इस बात में फिर कहाँ की अच्छाई है,
यूँ पल पल में तेरा हर किसी का हो जाना,
हम झूठे सही अगर यही सच्चाई है,
हक उस पर जता जो तेरा अपना है,
यहाँ तो मियां ये ज़िन्दगी भी पराई है,
वक़्त की चोट है इतनी जल्दी नही भरती,
उनसे पूछ कभी जिन्होंने ये चोट खाई है,
छोड़ दे ये फ़रेब , चालसाज़ियाँ "चौहान",
ना जाने कितनो को ये कब्र तक ले आई है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 14 October 2019

"ख़ामोश क्यों....???" (KHAMOSH KYU...???)


दबी हुई सी आवाज ,थोड़ी सहमी,
आँखें नम ,गला बैठा बैठा सा था,
एक रुदन सा था बातों में उसकी,
चहरे पर एक झूठी मुस्कान,
मानो लाखों बात छुपाये हुए थी,
माथे पर सिंदूर, हाथों का चूड़ा,
जैसे नई नई बिहाह के आयी थी,
अनजान था मैं उससे पर अपनापन सा था,
वो भी तो जैसे मानो कुछ बात बताना चाहती थी,
कुछ निशान थे चोट के जिस्म पर,
जिन्हें बार बार दुप्पटे से छुपा रही थी,
किसी के मान सम्मान में चुप थी,
छोटी गलती की बड़ी सज़ा पाए थी,
धुंधली ही सही बातें सब समझ आ रही थी,
पास खड़े सब्ज़ी वाले थे कुछ बहस हो रही है,
सब्ज़ी में आलू लेने थे उसे और बड़ी झिझक हो रही थी,
बार बार एक बात पूछे जा रही थी,
आलू मीठे तो नही भईया यही दोहरा रही थी,
परेशान हो सब्ज़ी वाले ने भी कहा,
एक दो मीठे निकल भी गए तो कोई बड़ी बात नही,
पर उसे ये बात असमंजस में ला रही थी,
कुछ वक्त इन्ही बातों पर उसकी आंखें छलक गयी,
गर्दन से थोड़ी चून्नी फिसल गई,
अब चोट का निशान चहरे - गर्दन पर,
साफ नजर आ रहा था,
उसकी बहस का राज़ साफ नजर आ रहा था,
बड़े रुदन स्वर में उसने कहा,
आप सामान बेच रहे हो तभी कोई बात नही है,
जैसा दिखता है वैसा समाज नही है,
अब बड़ी छोटी बात क्या है क्या समझाऊँ
कल सब्ज़ी में नमक कम था,
ये छोटी है या बड़ी बात क्या बतलाऊँ,
कांपते हाथों से आलू लिए और चल दी,
"खैर !! आप नही समझोगे",
ये उसके आखिरी संवाद थे,
अब इसे घर अंदर की बात कहो,
या समाज के हालात,
जैसा समझ आया लिख दिया,
उस वक़्त के "चौहान" ,
ये अनकहे जज़्बात थे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Saturday, 12 October 2019

"हार कर" (HAAR KAR)


हार ही तो गया हूँ ज़िंदगी मे ,
वक़्त से हालातों से,
जल ही तो रहा हूँ,
इन तन्हा ग़मो की बरसातों में,
टूटा भी तो इस कदर ,
के जुड़ने का सवाल ही नही था,
करवट ऐसी ली वक़्त ने,
जिसका ख्याल ही नही था,
कुछ बाकी रह गया था पीछे,
आज वो सब उजाड़ के आया हूँ,
कुछ कर्ज़ था किसी का मुझपर,
आज वो कर्ज़ भी उतार के आया हूँ,
जीत जाता तो शायद मेरे अपने हार जाते,
खुश हूँ "चौहान" के अपनो से हार के आया हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 10 October 2019

"व्यापार" (VAYAPAR)


झूठो की दुनिया थी,
मैं सच का तरफ़दार बनके आया था,
बारिशों का मौसम था ,
मैं एक जलती अँगार बनके आया था,
कहाँ खबर थी के मेरे आना ठीक नही,
पतझड़ के मौसम में बर्गो-बहार बनके आया था,
हश्र देख कतरा रहे थे लोग इश्क़ करने को,
हक़ीक़त है मैं इश्क़ का खुमार बनके आया था,
रात रात भर जाग कर लिखा है हाल जमाने का,
लोग समझते है मैं उनका तरफ़दार बनके आया था,
हर किसी ने अपना राज़ खोल दिया आगे मेरे,
जैसे तो उनका राज़दार बनके आया था,
किताबों के आख़िरी पन्नों पर लिखी बाते,
अब तलक याद है,
ये भी राज़ है के मैं एक कलमकार बनके आया था,
बर्बाद तो होना ही था "चौहान"
नासमझ था , पत्थरों की बस्ती में ,
शीशे के व्यापार करने आया था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 7 October 2019

"रावण-2" (RAVANN-2)


वो भक्त था शिव का भक्त सच्चा था,
हाँ हकीकत में रावण बहुत अच्छा था।।

अपना अंज़ाम ना सोचा बहन के सम्मान के आगे,
हाँ हक़ीक़त में वो भाई भी सच्चा था।।

मौत सामने देख भी डगमगाये ना कदम जिसके,
हाँ हक़ीक़त में वो अपने इरादों का पक्का था।।

छुआ नही पराई स्त्री को उसकी मर्जी के बिना,
मर्यादा पुरुषोत्तम तो नही पर अपनी मर्यादा का था।।

माना अपनी असीम शक्तियों से थोड़ा अभिमानी भी था,
तपस्वी, तेजस्वी, तांडव संगीतबद्ध करने वाला ज्ञानी था।।

ना जाने कितनी ही बार वक़्त ने उसे आज़माया था,
शिव भक्ति में शिव चरणों मे अपना शीश भी चढ़ाया था।।

एक बात है "चौहान" जो हर साल मेरे जहन में आ जाती है,
क्या वो भी राम था जिसने दशहरे में हर साल रावण जलाने का रिवाज चलाया था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 5 October 2019

"क्या हो गया" (KYA HO GYA)


समझ नही आता , आजकल मैं क्या हो गया हूँ,
पत्थर हो गया हूँ या पिंघल कर मोम हो गया हूँ।।

अक्सर तन्हा रात में अनजानी सी याद लेकर,
एक कोने में बैठकर पहरों पहर मैं रो गया हूँ।।

कोई गम कोई गिला शिकवा कुछ भी तो नही,
फिर क्यूँ ये हँसी छोड़ उदासियों का हो गया हूँ।।

मेरा हाल क्या है मेरी कलम भी ना कह पाती है,
सबकी कहानी लिखी अपनी में खामोश हो गया हूँ।।

क्या कशमकश है अब तुम्हे क्या समझाऊँ मैं,
ख्वाबों को ज़िंदा रखते रखते मैं दफन हो गया हूँ।।

ना डूब रहा हूँ ना किनारे नसीब हो रहे है यहाँ,
हाँ ,समुंदर में तैरती हुई बेड़ियों सा हो गया हूँ।।

कलम भी है "चौहान" लफ्ज़ भी और जज़्बात भी,
जिसपे लिखा ना जा सके वो गिला कागज़ हो गया हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 3 October 2019

"सहारा" (SAHARA)


मैं जलता चिराग था, हवाओं से सहारा माँग रहा था,
मैं एक आफ़ताब था, रातों से सहारा माँग रहा था।।

डूब जाता तो भी कोई बात नही थी इस सागर में,
मैं टूटी कश्ती था तूफानों से सहारा माँग रहा था।।

एक चिंगारी थी मेरे दिल मे जो आग बनानी थी मुझे,
इन लपटों के लिए मैं बारिशों से सहारा माँग रहा था।।

दिल की ज़मी एक अरसे से बंजर पड़ी थी मेरी ,
फ़िज़ाओं से नही खिज़ाओं से सहारा माँग रहा था।।

कलम सुख गयी थी पर कागज़ खाली थे ज़िन्दगी के मेरे,
अब स्याही से नही "चौहान" लहूं से सहारा माँग रहा था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 1 October 2019

"बाकी है" (BAKI HAI)


एक पल को ठहर जा,
अभी कुछ बात बाकी है।।

नज़र भर देख तो लूँ तुझे,
अभी ये मुलाकात बाकी है।।

ये रात गुज़र जाने दे ज़रा,
अभी मेरे कुछ ख़्वाब बाकी है।।

ज़िंदगी वही है जो तेरे संग है,
अभी जीने कुछ लम्हात बाकी है।।

पत्ते टूटे है तो कल नए भी आएंगे,
अभी दरख्तों पर शाख बाकी है।।

अभी दरिया ही तो बना हूँ कतरे कतरे से,
सागर में मिलने की अभी मेरी प्यास बाकी है।।

किसी बहाने से तू नज़र आता रहे,
बस ऐसे पलों की आस बाकी है।।

रोती रही मेरी कलम रात भर "चौहान" ,
अभी लिखना कुछ हिसाब बाकी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 28 September 2019

"मिल भी गए" (MIL BHI GYE)


अब हम मिल भी गए तो क्या होगा,
अब वो पहले वाली बात नही है।।

इश्क़ आज भी है तुझसे कल भी रहेगा,
पर अब वो पहले वाले ख़्यालात नही है।।

समझा लिया है अपने नादान दिल को,
अब पहले वाले हमारे हालात नही है।।

क्यों अश्क़ बहाऊँ अब तुझे पाने की खातिर,
हम पत्थरो में अब कोई जज़्बात नही है।।

दोस्ती कर ली है अब तन्हाई से हमनें,
अब किसी के साथ मे वो बात नही है।।

हाँ तू सोच ले अब फर्क नही पड़ता मुझे,
पर अब तू भी वो रूह-ए-कायनात नही है।।

मर जाना ही बेहतर था "चौहान" सो मर गए,
तेरे शहर में सच्ची मुहोब्बत की बिसात नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 27 September 2019

"हालात" (HAALAAT)


मत आ लौट के यहाँ हालात अच्छे नही है,
लोग भी अब पहले जितने सच्चे नही है।।

जो पहले हुआ करते थे अब वैसे साथ नही है,
बड़े बूढो में भी अब तज़ुर्बे वाली बात नही है।।

अब किसी के दिल मे कोई भाव उपकार नही है,
जो पहले मिलते थे यहाँ अब वो संस्कार नही है।।

बच्चो में भी कोई खास तहज़ीब, लियाक़त नही है,
चहरे पर नक़ाब है अब किसी मे शराफत नही है।।

बुराई की हुकूमत है कहीं दिखती अच्छाई नही है,
लाश कांधे है इंसानियत की अभी दफनाई नही है।।

देवी कहकर पूजते है पर नारी का सम्मान नही है,
सब बने फिरते हैवान है बचा कोई इंसान नही है।।

जिस्मों के भूखे है अब वो सच्चा प्यार नही है,
पैसों के रिश्ते है भाई-भाई वाला व्यवहार नही है।।

कला का भी अब मिलता कोई मोल नही है,
लफ्ज़ो का भी कब कोई तराज़ू तोल नही है।।

माँ बाप का भी अब उतना सम्मान नही है,
नरभक्ष लोग है अब यहाँ भगवान नही है।।

अब बातों में "चौहान" पहले जैसी सीख नही है,
मत आ लौट के यहाँ अब हालात ठीक नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 23 September 2019

"शिक्षा कहाँ है" (SHIKSHA KAHAN HAI)


शिक्षा कहाँ मिल रही है इस दौर में,
बस एक गौरखधंधा चल रहा है।।

होड़ लगी है बस पैसा कमाने की,
कोई बताएगा शिक्षा स्तर कहाँ बढ़ रहा है।।

किताबे बढ़ गयी है ज्ञान खो गया है,
नन्हीं सी उम्र में वो कितना वजन ढो रहा है।।

अगर ट्यूशन और कोचिंग में पढ़ाई है,
तो फिर स्कूलों में क्या हो रहा है।।

रेस लगी है हर चीज़ में आगे आने की,
नही देखते बच्चे का बचपन खो रहा है।।

विज्ञान की तररकी में कैद है सब,
पार्क मैदान सब सुनसान हो रहा है।।

हर चीज़ में आगे लाने की कोशिश में,
भविष्य छोड़ो वर्तमान भी खो रहा है।।

नही समझ आती ये कैसा विकास है,
सुकून मिट रहा है बचपन खो रहा है।।

हालात देख अब तो हँसी आती है "चौहान",
जमाना खुद अपनी कब्र खोद कर सो रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 22 September 2019

"पागल शायर" (PAGAL SHAYAR)


एक चेहरा देखा था एक रोज़ ,
मासुम, शरारत भरा,
नज़रों से नज़र मिली थी इस कदर,
सारा आलम गुमशुदा था,
वो था तो बेगाना कोई,
पर एक नज़र में अपना अपना सा लगा था,
बड़ी मशक्कत के साथ,
उनसे कुछ बात हुई,
पहली और आखिरी वो मुलाकात हुई,
उसके भी दिल मे अरमान थे,
मेरे भी दिल मे इश्क़ के तूफ़ान थे,
बस एक रात का ही वो फसाना था,
सुबहा दोनों को अलग हो जाना था,
ख्वाईशें दिल की थी उम्रभर साथ रहने की,
पर दोनों के पास अपना एक बहाना था,
सुबहा अखबार के एक टुकड़े पर लिखी,
उसके हाथों में एक बात रह गयी,
अधूरे इश्क़ की फिर अधूरी मुलाकात रह गयी,
बस फिर वो इस जहन में याद बनकर रह गयी,
ये मेरी मुहोब्बत की कहानी उस रात भर की थी,
"चौहान" वो मुलाकात बस लम्हात भर की थी,
अब हाथ मे कलम है , अल्फ़ाज़ों से याराने है,
अब तो पागल शायर है, कहाँ हम दीवाने है,
जो कहते है मुहोब्बत मिल जाती है,
छोड़ो, सब झूठे फ़साने हैं।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 20 September 2019

"हिस्सेदारी" (HISSEDARI)


सोया तो मैं भी नही हूँ उन रातों में,
जो राते तूने जाग कर गुज़री है।।

कभी महसूस ना होने दिया किसी को,
अश्कों से अपनी भी पुरानी यारी है।।

अकेले जज़्बात तेरे दिल मे ही तो नही,
इस मुहोब्बत में मेरी भी हिस्सेदारी है।।

जो मुझे तुझमे ढूंढती है पागलों की तरह,
वो तेरे ख़ातिर मेरे इश्क़ की ख़ुमारी है।।

मत आज़माया करो बात बात पर रिश्तों को तुम,
आज़माइश में लोगो मे रिश्तों में जान तक हारी है।।

एक अलग सी मुहोब्बत हो गयी है कलम से मेरी,
दर्दों को बयाँ करते लफ्ज़ो में अजब सी बेक़रारी है।।

चलते चलते दो कदम गिर क्या गया जमाने वालो,
"चौहान" ने चलना सीखा है मत समझो हिम्मत हारी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...