Monday, 21 September 2020

"दूरियाँ" (DOORIYAAN)



मैं सवालों में जी लूंगा,

तू जवाबों में जी,

जो ख़्याल हकीकत बना,

उन ख्यालों में जी,

ख़्वाईश भी क्या कुछ नही थी,

बस एक तेरी चाहत के सिवा,

मैं मर गया हूँ चल,

अब तू तेरी चाहतों में जी,

तू मेरी मैं तेरी आदत थे कभी,

तूने आदत ही बदल ली "चौहान",

चल अब तू तेरी आदतों में जी।।

मजबूरियाँ थी या मजबूरियाँ हो गयी,

दूरियाँ थी नही जो दूरियाँ हो गयी,

मैं तेरे बिन तू मेरे बिन,

चल खुश रह ,अब दुरियों में जी।।


शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Thursday, 17 September 2020

"इंतज़ार"(INTZAAR)



इंतज़ार मुझे भी रहेगा उस वक़्त का, उस लम्हात का,

तुझे झगड़ा ही सही पर एक मुलाक़ात का, 

अभी वक़्त और हालातों से मज़बूर हूँ,

रूह से नही ज़िस्म से ही दूर हूँ,

आज भी तेरे हालातों में खुद को जीता हूँ,

आज भी इंतज़ार में हूँ घूँट सब्र के पीता हूँ,

नाराज़गी गिले शिकवे सब दूर कर लेना फिर,

कहीं ना जा सकूँ इतना मज़बूर कर लेना फिर,

आज भी तेरी हँसी के लिए सबकुछ करने को तैयार हूँ,

तेरी खुशियों के लिए मरने को तैयार हूं ,

मत लाया कर यूँ आँखो में आँसू,

अब सहा नही जाएगा,

पास आकर जी भर के रो लेना,

इन मोतियों को थामने हाथ मेरा ही आएगा,

तू कहे या ना कहे मैं सब जानता हूँ,

एक रात तूने मजबूरियां बताई थी "चौहान" को,

मैं अब तलक अपनी कही बात मानता हूँ,

ये इश्क़ मेरी साँसों में रवा है,

मैं युहीं ना मिटने दूँगा,

फिर कभी आऊँगा तेरा होकर,

तेरी बात सुनने, तेरा हमसफ़र बनकर,

फिर वो वक़्त युहीं न गुज़रने दूँगा।।

मेरी हर साँस मुहोब्बत है तेरी,

मैं खुद को युहीं न मरने दूँगा।।


शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Sunday, 13 September 2020

"ख़त तेरे" (KHAT TERE)


बंद अलमारी में,पुरानी किताब में,मिले ख़त तेरे,

आलम क्या बताऊँ ,मैं कुछ कर नही पाया।।


हाथों ही हाथों में रह गए,खत तेरे दिए वो सारे,

क्या बताऊँ,ना मैं पढ़ पाया, ना ही जला पाया।।


एक ज्वालामुखी सा फुट गया यादों का तेरी,

मेरी आँखों का समुंदर ,जिसे बुझा भी ना पाया।।


उसी दौर में लेकर जा रहे थे, जिससे निकला भी न था,

कत्ल तो पहले ही थे, बस कभी दफ़न कर ना पाया।।


क्या लिखुँ कैसे गुज़री है रातें ,तन्हाई में तेरी याद लेकर,

बहुत कोशिश की "चौहान", कभी लिख ही ना पाया।।


शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Wednesday, 9 September 2020

"एक तरफा इश्क़" (EK TARFA ISHQ)


 

अब झूठ को सच लिखना क्यूँ है,

जैसे है नही हम वैसा दिखना क्यूँ है,

बड़ी यादें संभाल कर रखी है यूँ तो,

पर उन यादों में हमे जलना क्यूँ है,

तेरे अपने रास्ते है तेरी मंज़िल के,

तन्हा है ठीक है कोई साथ नही,

पर मंज़िलों को हमें बदलना क्यूँ है,

मैं जैसा हूँ क्या वो काफी नही है,

तेरे रंग में हमें ढलना क्यूँ है,

मुहोब्बत है तो फिर यकीन कर,

यकीन नही तो चाहे लाख आज़मा,

कोई अनदेखी तस्वीर ना बना , 

यूँ पानी पर तहरीर ना चला, 

जो तेरा है वो तेरा रहेगा , 

बावस्ता किसी को अपना ना बना , 

जो जा रहा है उसको जाने दे "चौहान", 

खाली हाथ तेरे है तो भी क्या, 

यूँ हर किसी के आगे हाथ ना फैला,

एक अरसे से तलाश में हूँ खुद की,

एक लाश दफ़न है मुझमे लापता,

अब होश-ओं-हवास कहाँ हमें,

खुद में ही मगन, खुद से ही जुदा,

ये किताबों के काले पन्ने रिहाई है मेरी,

यही सबूत इश्क़ के यही गवाह,

एक नाम छुपा कर रख लिया खुद में,

वो मेरा नही तो चल ना सही,

कोई जाकर पूछो हाल उसका,

क्या हो पाया है वो मुझसे जुदा,

एक खुशबू से महक उठता हूँ रोज़ युहीं,

मेरी कब्र पर रह गया शायद दुपट्टा उसी का,

मरकर भी कहाँ खत्म हुआ "चौहान",

किस्सा मेरे एक तरफा इश्क़ का।।


शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 7 September 2020

"मुर्दा शायर" (MURDAA SHAYAR)



ये जहाँ इतना अच्छा नही है,
तुम जिसमें आना चाहते हो,
अभी उम्र भी है और काम भी,
क्यूँ इश्क़ के सागर में डूब जाना चाहते हो,
ये एक माया जाल ही तो है,
तुम क्यूँ इसमें फँस जाना चाहते हो,
अभी सब नया नया है तो अच्छा भी लगेगा,
क्यूँ इस रौशनी में रौशनी गवाना चाहते हो,
ये जो आज सावन की बारिश भा रही है तुम्हे,
ये कल तुम्हे झुलसा भी देंगी,
क्यूँ इस आग में खुद को जलाना चाहते हो,
ये हिदायतें भी है और मशवरा भी "चौहान",
जिसका अंज़ाम मौत के सिवा कुछ नही,
तुम क्यूँ उन रास्तों पर जाना चाहते हो,
जब तक टहनियों पर है तब तलक खुशबू है,
क्यूँ इस फूल को तोड़ कर मुरझाना चाहते हो,
ये रातें जागने के लिए नही है,
इनकी आगोश में सो जाय करो,
क्यूँ इन रातों को अश्क़ों से भिगोना चाहते हो,
इश्क़ के दर्द में आराम नही मिलता,
कल कभी ऐसा मंज़र हो जाये,
ढूंढते फ़िरो मारे मारे तुम मरहम इसका,
कहीं फिर ये ज़ख़्म नासूर ना हो जाये,
मैं खुद इस राह में आकर पछता रहा हूँ,
कभी ये भी हँसता खेलता आँगन था,
जिसे आज मैं ख्वाबों का श्मशान बता रहा हूँ,
ये चार दिवारी घर थी जिसमें अरमान पलते थे,
आज इस घर को खँडहर बता रहा हूँ,
नही चाहता कोई मौत को गले लगा ले मेरी तरह,
नही चाहता कोई ज़िंदगी से कायर हो जाये,
ये कलम ताज़ा रखती है ज़ख्मों को जज़्बातों को,
नही चाहता कोई टूट के बिखर जाए मेरी तरहा,
नही चाहता कहीं एक और मुर्दा शायर हो जाये।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 2 September 2020

"हौंसला" (HAUNSLA)


 

चल माना मंज़िले नही, रास्ते है ,नसीब में,
इतना हौसला दे के उम्रभर इन रास्तों के हो जाऊं।।

चल माना नही है खुशियों का उजाला मेरी ख़ातिर,
इतना हौसला दे के ग़मो के अंधेरे में ही खो जाऊँ।।

बस एक उसकी जिंदगी रौशन करके रख खुदा,
फिर चाहे बदले में मैं नज़र-ए-आतिश हो जाऊँ।।

वक़्त कब किसकी राह देखता है "चौहान",
इतना हौसला दे के मैं उम्रभर राह उसकी देख पाऊँ।।

सुना है चट्टानों से टकराकर मुड़ जाती है लहरें वापिस,
चट्टान ही बना दे एक पल को सही उसे छू तो पाऊँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...