Tuesday, 19 January 2021

"शिकायत" (SHIKAYAT)

 


ऐसा तो हो नही सकता तेरे दिल में मुहोब्बत ना हो,
ऐसा भी कहाँ मुमकिन है मुझे तेरी ज़रूरत ना हो।।

इश्क़ में अगर मौत भी मिले तो मंज़ूर है मुझे पर,
ऐसा भी कहाँ के मुझे मुझसे ही कोई शिकायत ना हो।।

एक अरसा हो गया है तुझे देखे तुझसे बात किये मगर,
ऐसा भी कहाँ है की आज भी मुझे तेरी आदत ना हो।।

आज भी मग़रूर है ये दिल मेरा तेरे इश्क़ को लेकर,
ऐसा भी कहाँ है कि इस दिल मे वो शराफ़त ना हो।।

तेरे लिए भी लिखता हूँ और कभी तेरे ख़िलाफ़ भी,
ऐसा भी कहाँ है कि मेरे लफ़्ज़ों में लियाकत ना हो ।।

आज भी इश्क़ को अपना मुर्शिद अपना खुदा मानता हूँ,
ऐसा भी कहाँ है कि तेरा नाम लूँ और इबादत ना हो।।

हर क़दम हर राह तेरे साथ ही तो चला है "चौहान"
ऐसा कहाँ हुआ कि अनजाने रास्तों पे तेरी हिफाज़त ना हो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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