Wednesday, 26 July 2017

"उस रात " (USS RAAT)


जब गहनों से तू सजी थी अश्क़ों और गमो से हम ,
लबों की ख़ामोशी में आँखों से बोल उठे थे हम ,
जिस रात हमारी मुहोब्बत के वो ख्वाब मुक्कमल ना हो सके ,
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।


यादों में तेरी जब हम मशरूफ थे इस कदर ,
जेहन-ओ-जान को ना थी किसी की खबर ,
लम्हा लम्हा जब इस रूह को खो चुके थे हम ,
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।

जब मान कर चले थे तुझको ज़िंदगी का हमसफ़र ,
थाम के तेरा हाथ जब चले थे यूँ बेखबर ,
तेरे जाने से अपना मुक़ाम अपनी मंज़िल खो चुके थे हम
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।

लिखते भी तो क्या लिखते जब तेरा सहारा ना था ,
माँगा था जिसे दुआओं में "चौहान" वो हमारा ना था ,
दिल की जुबां बन आज बयां कर रही है मेरी कलम ,
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 20 July 2017

"लाखों मंज़र " ( LAKHON MANZAR)


लाखों मंज़र देखे इश्क़ के ,
अब वो पहले वाली बात कहाँ ,
अब वो इश्क़ के जज़्बात कहाँ ,
ना मौसम वो सावन के अब ,
वो प्यार भरी बरसात कहाँ ,
चले थे जिनको थाम कर ,
हाथों में अब वो हाथ कहाँ,
बन के चले थे जो हमसफ़र ,
अब वो हमारे साथ कहाँ ,
टूट के सब बिखर गए ,
वो कांच से जज़्बात यहाँ ,
तेरे संग थी जो गुज़री मेरी ,
अब वो प्यारी रात कहाँ ,
लफ़्ज़ों की ख़ामोशी पढ़ "चौहान",
तेरी कलम की यहाँ औक़ात ही क्या,
लाखों मंज़र देखे इश्क़ के ,
अब वो पहले वाली बात कहाँ ,

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


Tuesday, 18 July 2017

"साथ अगर " ( SATH AGAR)


एक नज़र भर देखना था तुझे, पल भर का भी अब सबर नहीं होता,
अपना हाल किस से कहूँ दर्द-ए-दिल पर किसी का असर नहीं होता ।।

लिखा था अश्क़ों की श्याहीं से दिल के कौरे कागज़ पर ,
नाम जिसका हमने उम्र भर काश लिखा वो मेरे मुक़्क़दर में होता ।।

ढल जाते शाम की तरह तेरी बाँहों की आगोश में ,
अगर किसी मरहम का असर तेरे दिए ज़ख्मों पर होता ।।

मुक़ाम मेरा भी था इश्क़ में हम भी निकले थे किसी राह पर
साथ अगर देता तू बनके हमसफ़र आज  "चौहान" काफ़िर ना होता ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Monday, 17 July 2017

"तू लाज़मी " (TU LAZMI)


तेरे बिना क्या सफर क्या ज़िंदगी है ,
तू आँखों की नमी तू लबों की हसीं है ।।

क्या आसमां मेरा कैसी तुझ बिन ज़मीं है ,
तुझे मैं ना सही पर मुझे तू लाज़मी है ।।

बात कैसे कहुँ तुमसे हाल-ए-दिल की ,
इस दिल-ए-नादान की मुश्किल की,
तेरी यादों में गुमशुदा हूँ इस ज़िंदगी में तेरी कमी है।।

कोई बदले जो मुक्कदर तो मैं भी फ़रियाद करूँ ,
तुझे पा के खुद को आबाद करूँ,
क्या बताये "चौहान" तुझ बिन आलम दिल का ,
ज़िस्म तो है बस रूह की कमी है ।।

तुझे मैं ना सही पर मुझे तू लाज़मी है ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Friday, 14 July 2017

"हिन्दुस्तान" ( HINDUSTAN)



जो बचपन में किताबों में पढ़ाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

जिसे कभी सोने की चिड़िया बताया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए।।

महापुरुषों की भूमि जिसे , ऋषिमुनियों का देश बताया ाता था,
मुझे वो हिंदुस्तान चाहिए  ।।

नहीं चाहिए ये ऊँची इमारतें ये बड़े बड़े मकान तुम्हारे ,
जहाँ लोगों को दिल में बसाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

दो जिस्मों का खेल बनकर रह गयी मुहोब्बत यहाँ ,
जहाँ गोपियों संग रास रचाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

दो गज़ ज़मीन खातिर बँट जाते है परिवार यहाँ ,
जहाँ भाई संग भाई बनवास जाया करता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

हिंदी अंग्रेजी दो पाटों में पीस रहा ये देश यहाँ ,
जहाँ माँ बोली को धर्म बताया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

आज अपनों से अपनी आबरू का डर नारी को यहाँ ,
जहाँ नारी को देवी बनाके पूजा जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

गुरु शिष्य की क्या बात करूँ आज इस कलयुग में ,
जहाँ एकलव्य जैसा शिष्य और द्रोणा जैसा गुरु पाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

राम कृष्ण की क्या बात कहूं वो तो चलो भगवन है ,
जहाँ गौ और गंगा माँ को पूजा जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

किसी मज़हब की बात करना मुझे गवारा नहीं पर ,
जहाँ ईद दिवाली को मिलकर मनाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

माना के सोच , रीती रिवाज़ सब बदल गए "चौहान" वक़्त के साथ ,
जहाँ "भारत माता की जय" से सारा विश्व गूंज  जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

जो बचपन में किताबों में पढ़ाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"मेरा क्या कसूर " (MERA KYA KASOOR)


मेरा क्या कसूर अगर याद तेरी आयी ,
खामोश लबों पर बस एक बात तेरी आयी,
पलकों पर आकर ठहर गए आँसू,
अब के सावन भी तेरा आया और बरसात भी तेरी आयी।।

बेदखल कर दिया हमने ज़िंदगी को ज़िंदगी से ,
जब छोड़ के गए थे तुम साथ मेरा ,
एक दफा मुड़के देखा तक नहीं तूने मुझे ,
क्यों तुझे फिर मेरी तड़प भी नज़र ना आयी।।

कहाँ है मंज़िल कोन सा है रास्ता कुछ याद नहीं ,
मिटा दिया वो सफर भी जहाँ हमसफ़र बनके तू साथ नहीं ,
वीरानियाँ है अब इस दिल के आँगन में "चौहान",
वो गयी ऐसे वक़्त की तरह के फिर कभी लौट के ना आयी।।

मेरा क्या कसूर अगर याद तेरी आयी ,
खामोश लबों पर बस एक बात तेरी आयी,
पलकों पर आकर ठहर गए आँसू,
अब के सावन भी तेरा आया और बरसात भी तेरी आयी।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


"गुज़रे-लम्हे"(GUZRE LAMHE)


गुज़रे लम्हे याद बनके आएंगे ,
तेरे दिल की दुनिया में सैलाब बन कर आएंगे ।।

आँखों से आंसू थम ना पाएंगे ,
तेरे जहन में ऐसे ख्यालात बन कर आएंगे ।।

सवेरा नया होगा पर वो पल ना तेरा होगा ,
मुझे पाने को बेबस जब दिल तेरा होगा ।।
ऐसे दर्द-ए-दिल के हालत बनकर आएंगे ,
गुज़रे लम्हे जब याद बन कर आएंगे ।।

तेरी तन्हाइयों में शरीक़ जब हम होंगे ,
हर पल तड़पते तुझे जब ये गम होंगे ।
कहाँ तेरे दिल में फिर "चौहान" के सिवा किसी और का बसेरा होगा ,
तेरे लबों पर फिर वो गम दर्द भरे अलफ़ाज़ बन कर आएंगे ।।

गुज़रे लम्हे जब याद बन कर  आएंगे  ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"बिन तेरे " (BIN TERE)


अधूरा इश्क़ , अधूरी ज़िंदगी , अधूरे हम ,
बिन तेरे मुक्कमल होते भी तो कैसे।।

माना मंज़िल पाने की चाह छोड़ दी हमने ,
तुझ जैसा कोई हमसफ़र पाते भी तो कैसे।।

अरमान जला के सब राख कर दिए इस दिल के मैंने ,
तुझ बिन कोई ख्वाब सजाते भी तो कैसे।।

अब बस तन्हाई ही तन्हाई नज़र आती है हर कहीं ,
तुझ बिन कोई महफ़िल सजाते भी तो कैसे।।

रख लिया दबा के दिल ने अपने दर्दों को ,
तुझबिन किसी को हाल-ए-दिल बताते भी तो कैसे।।

छोड़ "चौहान" मतलब की दुनिया में बेमतलब से जीना ,
मतलबी लोगों में बेमतलब इश्क़ का एहसास करवाते भी तो कैसे।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 13 July 2017

"फासले" ( FASLE)


क्यूँ फासले आज हमारे दरमियाँ है ,
तू नहीं तो सुना मेरा ये जहाँ है ।।

बात मुकद्दर की तो नहीं है मिलना बिछरड़ना,
फरेब की दुनिया में ये मेरे इश्क़ का इम्तिहान है।।

कौन आ के बसेगा मेरे तन्हा दिल में तेरे सिवा,
इस दिल में खंण्डर तेरे बिन एक मकान है ।।

मेरे लिए तो मेरा पीर-ओ-मुरशद मेरा परवर दिगार है,
तेरे बिना मेरे लिए घर मंदिर सब शमशान हैं।।

तुम होते तो शायद ना होती "मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ "
तू सोच के देख मेरे बिना  क्या वजूद तेरा "चौहान" है।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"तेरी-मौजूदगी " ( TERI MOZUDGI)


साँसों में अब भी वो रवानगी है ,
जज़्बातों में अब भी वो दीवानगी है ,
पागलपन है हद्द से ज़्यादा बेखुदी है ,
तू कहीं भी रहे मेरे दिल में तेरी मौजूदगी है।।

आँखों में एक तड़प एक इंतज़ार है ,
एक अरसे से तुझे देखने को बेक़रार है ,
तन्हाइयों का आलम है मेरे ज़ेहनोजान में ,
मेरे लम्हों में अब आहिस्तगी है ,
तू कहीं भी रहे मेरे दिल में तेरी मौजूदगी है।।

हर बात में आज भी तेरा ज़िक्र है ,
हर पल दिल को तेरी फ़िक्र है ,
तेरे दिए जो पैगाम है "चौहान" को ,
उनमे आज भी ताज़गी है
तू कहीं भी रहे मेरे दिल में तेरी मौजूदगी है।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

" तुम साथ होते " ( TUM SATH HOTE)


ना ये हालत होती , ना ये हालात होते ,
ना कुछ ख्याल होते , ना कुछ जज़्बात होते ,
फिर कुछ अलग ही ये लम्हात होते ,
आज अगर तुम साथ होते ।।

टूटा ना ये दिल होता , जीना ना यूँ मुश्किल होता ,
बड़ा हसीं ये सफर होता तू जो मेरा हमसफ़र होता ,
ना ये तन्हा रातें होती ना ये अश्क़ों की सौंगात होते,
फिर कुछ अलग ही ये लम्हात होते ,
आज अगर तुम साथ होते।।

रखता बसा के सीने में तुझे रूह की तरहां,
बहती रगो में "चौहान" के तू लहू की तरहां,
ना यूँ बेखबर तुम होते , ना यूँ लम्हा-लम्हा हम रोते,
फिर कुछ अलग ही ये लम्हात होते ,
आज अगर तुम साथ होते।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

"तुम्हें मुझसे प्यार " ( TUMHE MUJHSE PYAR)


मैं नहीं तेरे ख्वाबों का राजकुमार ,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

तेरे दिल को नहीं मेरी चाहत की दरकार,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

माना तलाशती है तेरी नज़रें किसी और को ,
उनको नहीं मेरे आने का इंतज़ार ,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

गम ही गम मिलते रहे है तुमसे ,
नहीं हुई तेरी कोई ख़ुशी मेरी तरफ़दार,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

क्या हुआ जो तुम रहते हो सोचों में ग़ुम,
मेरा आया न तुम्हे ख्याल एक भी बार ,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

नमाज़ें भी पढ़ी सजदे भी किये ,
तूने ही ना की हमें पाने दरक़ार,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

लिखते रहो चाहे उम्र भर "चौहान",
तुम्हारी कलम से हुआ ना मेरा ज़िक्र एक भी बार ,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Wednesday, 12 July 2017

"क्या हुआ अगर " ( KYA HUA AGAR )



क्या हुआ अगर तू बुलाये या न बुलाये ,
तेरे दिल की चोखट पर आ ही जाऊंगा ।।

क्या हुआ अगर तू मेरा जिक्र मेरी बात ना करे ,
लफ्ज़ बन के तेरे लबों पर आ ही जाऊंगा ।।

क्या हुआ अगर तू महसूस ना करे ,
हवा बन के तेरी साँसों में घुल ही जाऊंगा ।।

क्या हुआ अगर कबूल न हो सजदे मेरे ,
तेरे इश्क़-ए-इब्बादत में मर भी जाऊंगा ।।

तू माने या ना माने "चौहान" को अपना ,
मैं तो मरकर भी तेरी ही कहलाऊंगा  ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"साथ कहां " ( SATH KAHAN)



माना ज़िंदगी के सफर में साथ चलता है काफ़िला
पर इश्क़ में मुक़्क़मल वो साथ कहाँ मिलते है ।।

माना मिले है चंद लम्हात साथ उनके जीने के ,
पर उम्र भर जो थामे वो हाथ कहाँ मिलते है ।।

सफर भी होता है और यहाँ हमसफ़र भी ,
मंज़िल और हमसफ़र कहाँ एक साथ मिलते है ।।

ख़ुशी कम है तो गम हज़ारों है यहाँ ,
ताह उम्र प्यार भरे वो जज़्बात कहाँ मिलते है ।।

माना लकीरें हज़ार है हाथों में "चौहान",
पर जिनमें तुम मिल जाओ वो हाथ कहाँ मिलते है  ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Monday, 10 July 2017

"गुनाह" (GUNAAH)



इश्क़ तुझसे किया तो क्या गुनाह किया ,
जितना जिया तुझमे जिया तो क्या गुनाह किया ।।

क्या करूँ अगर आता नहीं ख्याल किसी और का ,
जब भी लिया नाम तेरा लिया तो क्या गुनाह किया ।।

सफर में तुम भी थे सफर में हम भी थे ,
तुझे मंज़िल बना के चला तो क्या गुनाह किया ।।


उदासी तो रहती है आज भी इस चेहरे पर ,
तेरी ख़ुशी में थोड़ा हंस लिया तो क्या गुनाह किया ।।

तुम पूछो ना पूछो हाल -ए-दिल मेरा ,
करली जो थोड़ी फ़िक्र तेरी तो क्या गुनाह किया ।।

क्या हुआ जो तुम मिल न सके हमे इस ज़िंदगी में ,
तुम्हे ज़िंदगी बना के जिए तो क्या गुनाह किया ।।

क्या हुआ तुझे अगर क़बूल नहीं "चौहान",
तुझसे चाहत नहीं तेरी इबादत की तो क्या गुनाह किया।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


"कभी सोचा है " ( KABHI SOCHA HAI)


कभी सोचा है ये तूने मैं ना रहा तो ,
तुमसे यूँ मुहोब्बत करेगा कौन

खुद के जिस्म की बना के रूह तुमको ,
तुमसे यूँ चाहत करेगा कौन ??

कौन करेगा यूँ हरपल फ़िक्र तेरी ,
तेरे लिए नींदें खराब अपनी करेगा कौन ??

कौन करेगा सजदे दर-दर तेरी ख़ातिर,
तुझे पाने की हसरत फिर करेगा कौन ??


कौन करेगा हद्द से ज़्यादा इश्क़ तुम्हे मेरे बाद ,
तुझे खुदा बना के तेरी इब्बादत करेगा कौन ??

कर बेपरवाही लाख "चौहान " से मगर याद रखना ,
मेरे बाद तेरे गमो से अपना दामन फिर भरेगा कौन ??

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Friday, 7 July 2017

"रोई तो होगी" ( ROI TO HOGI)


रोई तो होगी वो भी मुझसे दूर होके ,
दुनियाँ के खोंखले रिवाज़ो में मजबूर होके ।।

टूटे होंगे ख़्वाब उसके भी शीशे की तरहा ,
सहमी होगी रूह उसकी यूँ निश्त-ओ-नाबूद होके ।।

अब सजना-सवरना भी उसको कहाँ अच्छा लगता होगा ,
करती होगी शिकवे किस्मत से गमो में चूर होके ।।

छिप गयी होगी वो चेहरे की मुस्कान उदासियों के पीछे ,
याद करती होगी चेहरा मेरा अपनी आँखों को मींचे।।

रंग फीका लगा होगा उसे मेहँदी का मेरे इश्क़ के रंग के आगे ,
ये दुनिया भी फिर उसे बेरंग नज़र आयी होगी मुझसे दूर होके ।।

पहन कर लाल जोड़ा जब किसी और के नाम की मांग सजाई होगी ,
रात बिस्तर पर मेरे इश्क़ की लाश बिछाई होगी।।

कटपुतली सी बन कर रह गयी होगी फिर वो ,
फिर कहाँ उस जिस्म में वो रूह लौट कर आयी होगी।।

अब कौन आँसू पोंछ उसे सीने से लगता होगा ,
कौन होगा जो खुद रोकर भी उसे हॅसता होगा ।।

शायद अब भी वो उँगलियाँ अपनी लटों में घुमाती होगी ,
शायद अब भी वो बिन बोले मेरे दिल का हाल जान जाती होगी।।

शायद अब भी उसे पल-पल मेरी फ़िक्र सताती होगी ,
शायद अब भी उसे तन्हाई में मेरी याद आती होगी ।।

क्यों छोड़ जाते है लोग अक्सर इश्क़ में मग़रूर होके ,
तूने भी क्या पा लिया "चौहान" इस बस्ती में मशहूर होके ।।

रोई तो होगी वो भी मुझसे दूर होके ,
दुनियाँ के खोंखले रिवाज़ो में मजबूर होके ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

"बेशुमार "(BESHUMAR)


चाहतें तुमसे ऐसी बार-बार होंगी ,
हर बार युहीं बेशुमार होंगी।।

आँखों में रहेगा एक चेहरा तेरा ,
दिदार- ए -हसरत युहीं बेशुमार होंगी ।।

फिर एक ख्वाब होगा हर रात तुमसे मिलने का ,
मिलने की हसरतें तुमसे युहीं बेशुमार होंगी ।।

भर लूंगा हँस के दामन तेरे दर्द-ओ-गम से अपना ,
हर जनम तेरी ख़ुशी के लिए मिटने की लगन बेशुमार होगी।।

क्या हुआ अगर मुक़्क़मल न हो सकेगा ये फलसफ़ा इश्क़ का ,
हर सज़दे में तुझे पाने की चाहत बेशुमार होगी ।।

क्या हुआ "चौहान " अगर तुम  मिले न मिले इस जनम ,
तुम्हे खुदा बना तेरी इबादत हर जनम युहीं बेशुमार होंगी।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां


Thursday, 6 July 2017

"मुहोब्बत " (MUHOBAT)



क्या हुआ अगर गुनहगार सिर्फ हम ही बताये ,
उनसे मुहोब्बत भी तो हमने ही की थी ।।

क्या हुआ अगर सारे इल्ज़ामात हम ही पर आये ,
उन्हें पाने की हसरत भी तो हमने की थी ।।

कसूर उनका क्या था आखिर इसमें कसूर तो हमारा था ,
उन्हें खुदा बना पाने की ज़ुर्रत भी तो हमने ही की थी ।।

भूल गया था बिक जाना पड़ता है इश्क़-ए -बाजार में ,
महोब्बत में ताज़महल बनाने की ख्वाइश भी हम ही ने की थी।।

किसको क्या फर्क पड़ता है किसी के जीने मरने से " चौहान" यहाँ ,
मतलब की दुनियाँ में बेमतलब की मुहोब्बत भी तो हमने ही की थी ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Wednesday, 5 July 2017

"दीदार -ए- हसरत " (DEDAAR - E - HASRAT)


तामाम इंतज़ाम किये थे हमने चकाचोंध के ,
इंतज़ार था बस उनके एक दफ़ा आने का ।।

आँखों से आंसू छलक आये थे उनके बस एक दिदार को ,
एक अरमान था चाँद उनके लिए आँगन में सजाने का।।

ना जाने कितने ख़्वाब सँजो रखे थे उनसे मिलने की तलब में ,
आज भी ज़ज़्बा था उसकी खातिर दुनियाँ से लड़ जाने का।।

वो रात भी पूरी मदहोश थी आज दिदार -ए -हसरत के लिए ,
मिट रहा था बहाना धीरे -धीरे तन्हा जिए जाने का ।।

बेताब थी मेरे दिल की बंज़र ज़मी बरसों की प्यास बुझाने को ,
एक अरसे बाद लगा था मौसम फिर से सावन आने का ।।

लगता है कबूल करली आज दुआ उस खुदा उस भगवान ने ,
"चौहान " आज फिर मिलने वाला है मौका प्यार में मिट जाने का ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"लौट के ना आऊँगा" ( LAUT KE NA AAUNGA)



चला गया जो छोड़ के, फिर कभी लौट के ना आऊंगा ,
ख्वाबों में आना तो दूर , ख्यालों में भी ना आऊंगा ।।

कोई गम ना रहने दूंगा पास तेरे फिर भी ,
अपनी ख़ुशी दे के तुझे ,तेरे गम चुरा ले जाऊंगा ।।

कर सको तो महसूस कर लेना मुझे अपने खालीपन में ,
मैं तो हवा बनके इन वादियों में घुल जाऊंगा ।।

कहाँ रोक पाओगे फिर मुझे तुम उन बहती आँखों में ,
मैं तो अश्क़ बन के आँखों से निकल जाऊंगा ।।

कर लेना कैद अगर कर सको तो "चौहान" को अपनी ख़ामोशी में ,
मैं तो लफ़ज़ बन तेरे होंठों से निकल जाऊंगा ।।

चला गया जो छोड़ के, फिर कभी लौट के ना आऊंगा ,
ख्वाबों में आना तो दूर , ख्यालों में भी ना आऊंगा ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम-दिल की ज़ुबाँ


Tuesday, 4 July 2017

"ए ज़िंदगी " ( AE ZINDGI)


रूठ सा गया हूँ ,तुझसे ए ज़िंदगी ,
टूट सा गया हूँ मैं अभी-अभी ।।

दिल रो रहा है पर आँखों में आंसू नहीं ,
कैसे समझाऊ दिल को खुद पर भी काबू नहीं ।।

अजीब खेल है खुदा का भी , जिस से प्यार है उसे पास लता नहीं ,
तुझसे नफरत है तो तुझे मुझसे दूर ले जाता नहीं।।

देख हालत मेरी मुझे तो समझ आती नहीं ,
"चौहान" आँखों में नमी है चेहरे पर हसीं।।

मंज़िल तो मौत है फिर क्यों चला जा रहा हूँ तेरे संग बेवजा युहीं ,
क्यों लिए फिर रहा हूँ एक उम्र भर की तन्हाई और बेबसी ।।

रूठ सा गया हूँ ,तुझसे ए ज़िंदगी ,
टूट सा गया हूँ मैं अभी-अभी ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


Monday, 3 July 2017

" तेरी￰ याद " (TERI YAAD)



अमावस की रात के अँधेरे की तरह ,
मेरे जहन-ओ-जां पर ये बढ़ती जाती है।
आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।

ख़ामोशी को सजा के रखता हूँ अपने लबों पर ,
ये गुस्ताख़ आँखें है जो सब बता जाती है ।
आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।

आज भी तुझसे तेरे नाम से मुहोब्बत करता हूँ मैं ,
जिस्म में रुह की तरहां,रगो में बहते लहु की तरहां,
तेरे नाम को मेरे नाम से जोड़ के रखता हूँ मैं।
तुझे पाने की थोड़ी सी हसरत क्या करने लगता हूँ ,
मेरी किस्मत मुझे मेरी औकात दिखा जाती है ।।

आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।

आज भी अच्छा लगता है मुझे तेरा इंतज़ार करना ,
तुझसे एक पल भी बात करने को खुद को बेक़रार करना ।
ढल जाती थी कभी शाम तेरे हाथों को हाथों में थामे,
आज वो यादें मुझे रात-रात भर रुला जाती है ।।

आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।

बनाना चाहा तुझे हमसफ़र इश्क़ में तूने काफ़िर बना दिया,
इश्क़ के सफर में उम्र भर का मुसाफिर बना दिया ।
तेरे पास आने की बेइख़्तियारी "चौहान" को ज़िंदगी से दूर ले जाती है।।

आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो  मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ



"एक-ख्याल " ( EK KHYAL)

आज कुछ लिखने को नहीं था ,
फिर भी कलम उठा के सोचता रहा ..
सोचता रहा रात भर के क्या लिखूं ???
फिर कहीं दूर दिल में झांक कर देखा ,
तो मुझे बस तेरा ख्याल आया ...
फिर सोचा के आज कुछ लिखूं तेरे बारे में,
पर ना जाने क्यों वो जज़्बात -ए-तहरीर थम गयी,
और सोचता रहा रात भर ,
तेरी बेपरवाही लिखूं या फिर तेरी बेवफाई लिखूं ,
बस इसी मजलिश में रात भर जागता रहा ,
और सोचता रहा के क्या लिखूं ???
जब आँखों को बंद करके देखा ,
तो तेरी सूरत नज़र आयी ...
फिर लिखने लगा जो मुझे हर कहीं ,
बस तेरी बेगैरत नज़र आयी ...
जब लिखना चाहा के क्यों अब तक मुझे तेरा इंतज़ार है ,
क्यों अब तक मेरे इस दिल को तुमसे प्यार है ..
बस इन्ही सोचो ने तुझे याद कर आँखों का सागर छलका दिया ,
कुछ लिख ना पाया "चौहान " उस रात ,
जो लिखा वो तेरी याद में बहे मेरे आंसुओं ने मिटा  दिया ...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Sunday, 2 July 2017

"इश्क़-ए-मिजाज़ " (ISHQ-E-MIZAZ)

वक़्त बदला ,वक़्त के साथ बदला ये मौसम ,
पर मेरे इश्क़ का मिज़ाज नहीं बदला ।।

मर कर भी जी रहा हूँ देख तेरे बिन ,
आज भी मेरे जीने का अंदाज़ नहीं बदला ।।

ना जाने कितनी रातें गुज़ार दी तेरे इंतज़ार में ,
पर मेरी खामोशियों का वो साज़ नहीं बदला ।।

मेरी कलम बन तो बैठी ज़ुबाँ दर्द- ऐ -दिल की ,
"चौहान" की कलम से तेरे ज़िकर का  वो रिवाज़ नहीं बदला ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Saturday, 1 July 2017

" कोई तो होगा " ( KOI TO HOGA)

दीया मेरे जज़बातों का किसी के दिल में कहीं तो जलता होगा ,
ये सोच के लिख देता हूँ हाल-ए-दिल कोई तो होगा जो रात भर बैठ के पढता होगा ।

भले ही कोई नज़र नहीं आता मुझे अपने आस-पास ,
पर कोई तो होगा जो तन्हाई में रात भर मेरे साथ जगता होगा ।।

भले ही समझ लिया होगा दुनिया ने बेगाना मुझे ,
पर कोई तो होगा जो मेरे गमो को अपना समझता होगा ।


हम मरते रहे पल-पल तुम्हें पाने की हसरत लेकर ,
पर कोई तो होगा जो मुझे पाने को तड़पता होगा ।।

ये तो एक रिवाज़ हो गया इश्क़ का ,जो मुझे तुमसे है तो तुम्हे किसी और से ,
पर कोई तो होगा जो इन रिवाज़ों में बंधकर भी मुझसे प्यार करता होगा ।

बस यही  सोच कर लिख देता है चौहान , मुझे तो अब जीना नहीं ,
पर कोई तो होगा जो मुझे देख कर जीता होगा ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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