Friday, 20 October 2017

"एक किस्सा " (EK KISSA)


"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..
इश्क़ में हालातों का ,
गुज़री तन्हा रातों का ...
"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..

तन्हा उन काली रातों का ,
पल पल साथ तेरी उन यादों का ,
जो होती थी कभी उन हसीं मुलाक़ातों का,
"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..

ख़त में लिखे हुए उन जज़्बातों का,
रात भर जाग कर की जो उन बातों का ,
तुझे लेकर जहन में रहते उन खयालातों का,
"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..

इश्क़ में मिली बेवफाइयों का ,
पल पल बढ़ती हुयी रुस्वाइयों का ,
"चौहान" से की तूने उन बेपरवाहियों का ,
"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 19 October 2017

"जीता भी तो कितना " (JEETA BHI TO KITNA)


जीता भी तो कितना जीता ज़िंदगी तेरे बिन,
साँसों को तो रुक जाना ही था ..

ढूंढता भी तो कितना ढूंढता मरहम दिल के ज़ख्मो का,
नासूर तो इन्हे इक दिन बन जाना ही था ..

छोड़ के तो एक दिन यूँ भी तुम्हे मुझे चले जाना था ,
मुक़दर और लकीरों का तो बहाना ही था ..

किसे पता था की वक़्त इतना बदल जायेगा "चौहान" के वो कहेंगे ,
झूठे तो तुम थे सच्चा तो ये सारा ज़माना ही था ...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल कि जुबां

Monday, 16 October 2017

"तुम ना आये होते " (TUM NA AAYE HOTE)


ना ये दर्द होते , ना ये गम होते ,
अगर मेरी ज़िंदगी में तुम ना आए होते...

ना रोती ये आँखें ना तरसती तेरी एक झलक को ,
अगर कभी तुमसे हमने नैन ना लड़ाए होते...

ना सुलगता ये दिल का आँगन, ना होता तन्हाइयों का आलम,
अगर कभी तुमसे हमने दिल ना लगाए होते ..

ना होते ये जज़्बात ,ना होते ये ख्यालात ,
अगर तेरे इश्क़ में ख़ुद को ना लुटाये होते ..

ना बनाता "चौहान" "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ"
अगर रोग तेरे इश्क़ का  यूँ लगाए ना होते ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Saturday, 14 October 2017

"सामने न हो तुम " (SAMNE NA HO TUM)


जब सामने ना हो तुम ,
तो आँखों को करार कहाँ...
जब जिक्र ना हो तेरा,
तो बातों में क़रार कहाँ ..
जब खाव्बों में ना हो तुम,
तो नींदों में क़रार कहाँ ..
जब जज़बातों में ना हो तुम,
तो इश्क़ में करार कहाँ ...
जब मरहम ना बनो तुम ,
तो इन ज़ख्मों में क़रार कहाँ..
जब "चौहान" तेरे अलफ़ाज़ ही नहीं मेरे नाम,
तो "मेरी कलम"- "दिल की जुबां" कहाँ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Friday, 13 October 2017

"याद तो आता होगा " (YAAD TO AATA HOGA)


आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ,
हर एक पल हर एक वो लम्हा ...
मिलने की बेकरारी दिन में और ,
रातें तन्हा तन्हा ...
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

वो मुझसे यूँ छुप छुप के मिलना ,
मेरे हाथों को थामे संग संग चलना ,
सावन की पहली बारिश में मेरे संग भीगना ,
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

वो तेरा दिन भर का इंतज़ार ,
वो बेफ़िक्री में छुपा हुआ प्यार ,
वो शाम को मीठी सी तकरार ,
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

वो मेरी बाजुओं में सिमटना,
वो तेरा मुझसे यूँ लिपटना ,
वो रात भर मिलने को तड़पना,
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

वो तेरे लबों को छूकर निकालता मेरा नाम ,
वो तेरे इश्क़ में ढलती मेरी हर शाम ,
वो चौहान की कलम से लिखा इश्क़-ए-पैगाम,
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां 

Thursday, 12 October 2017

"मुझे इंतज़ार रहेगा " (MUJHE INTZAR RAHEGA)



मुझे इंतज़ार रहेगा उस शाम का ...

जिस पल तेरे हाथों में हाथ मेरा होगा,
तेरे चेहरे के नूर सा सवेरा होगा ...

शामे गुज़रेंगी तेरे आगोश में मेरी ,
मेरे चहरे को तेरी ज़ुल्फ़ों ने घेरा होगा ...

पहरों तेरा दीदार होगा ,
इश्क़ का नया रंग नया खुमार होगा ..

तेरा दिल भी जब मेरे लिए बेक़रार होगा,
मेरी एक झलक का ये तलब्दार होगा ...

काली घनी रात में ना वो चाँद अकेला होगा ,
ना तेरे लबों पर ख़ामोशी होगी ,ना ये तन्हाईयों का मेला होगा ....

मुझे इंतज़ार रहेगा उस शाम का ....

जब तेरे हाथों की मेहँदी का रंग गहरा होगा ,
जब तेरा मेरी बाँहों में नया सवेरा होगा ..

जब पहन के आएगी तू लाल रंग का जोड़ा "चौहान" के नाम का ,

मुझे इंतज़ार रहेगा उस शाम का ....

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

"बदल सा गया हूँ " (BADAL SA GYA HOON)


जब से तेरी चाहतों में ढल गया हूँ मैं ,
सब मुझसे कहते है की बदल गया हूँ मैं ....

कोई और ख्वाईश ना की खुदा से तुझे देखने के बाद ,
आज तुझे पाने को कितना मचल गया हूँ मैं ...

कौन करेगा इंतज़ार मुहोब्बत में इतना ,
तु आ के देख वक़्त की आग में कितना जल गया हूँ में..

क्या लिखे "चौहान" पैग़ाम-ए- मुहोब्बत,
फुर्सत मिले तो देखना शाम के सूरज की तरह ढल गया हूँ में...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां 

Tuesday, 3 October 2017

"बीते-दिन " (BEETE DIN)


मिली थी नज़रें तो थम सा गया था वक़्त ,
ना होश था खुद का ना कोई थी खबर ..
नज़रे चुरा के तू भी देखा करती थी ,
बात करने के बहाने तु भी ढूंढा करती थीं ..
मेरी ख़ामोशी तक पढ़ लेती थी जब तु,
क्या वो बीते दिन याद हैं तुम्हे..
वो सावन की पहली बारिश में साथ मेरे भीगना ,
वो लंबे रास्तों पर तेरा हाथ थामे चलना ,
वो मुझे मिलने को पल पल मचलना ,
वो खुद से भी ज़्यादा मेरी फ़िक्र करना ,
वो तेरे संग गुज़री थी जो शाम ,
क्या वो बीते दिन याद है तुम्हे...
तेरा वो बारिश में मेरे संग भीग जाना ,
वो बिजलियों की खड़खड़ाहट से मेरी बाँहों में सिमट जाना ,
तेरा वो अपने हाथों से खिलाना ..
क्या वो बीते दिन याद है तुम्हे ....
तेरा वो मेरी आदतों में ढल जाना ,
तेरा यूं मुझे पल पल रुलाना ,
तेरा वो बीच सफ़र में छोड़ जाना ,
"चौहान " की जान बन के निकल जाना ..
तेरी हर सजा हर सितम  याद है मुझे पर ,
क्या वो बीते दिन याद है तुम्हे ...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां



"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...