Sunday, 31 March 2019

"रात की कहानी" (RAAT KI KAHANI)


कोई दूरियों की वजह पूछे तो बेधड़क बताना,
ये इस रात की नही ये उस रात की कहानी है।।

ये सौंगात प्यार की , कोई प्यार की सौंगात नही,
साँसों से साँसे मिली थी कभी उसकी निशानी है।।

समझा था हमने के वो है हक में दिये की रौशनी के,
हवाओं संग देख,अनदेखा कर बैठे, हमारी नादानी है।।

कब किनारे नसीब हुए है बेड़ियों को समुंदर में,
इश्क़-ए-समुंदर में ये कहानी जानी पहचानी है।।

एक ना एक दिन अलग तो होना ही था "चौहान",
कब उसने कहा था के हर वादे हर बात निभानी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 28 March 2019

"कुछ और है" (KUCH AUR HAI)


कभी तो समझ जाओ ये जज़्बात कुछ और है,
जो तुम्हे खामोशी लगती है वो मेरी बेबसी का शोर है।।

क्यों बेचैन हो जाते है तुम्हारे लिए हम बिन बात,
लगता है किसी कच्चे रिश्ते की ये कोई पक्की डोर है।।

दिखाई नही देते हर किसी को पर दर्द बहुत देते है ,
इस रोग में हकिम तेरे अलावा कहाँ कोई और है ।।

इतना भी ना आज़माओ मुझे के मैं टूटे ही जाऊँ,
आईना हूँ तेरा माना वज़ूद मेरा थोड़ा कमज़ोर है।।

"चौहान" तो कब का तोड़ देता तालुकात तुझसे ए ज़िन्दगी,
एक दिल ही है मेरा ये जो थोड़ा तेरे इश्क़ में मग़रूर है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।






Wednesday, 27 March 2019

"ऐसे ना सोचा करो" (AISE NAA SOCHA KRO)


मिलकर जुदा हो जायेंगे , ऐसे ना सोचा करो,
हम तुमको भूल जाएंगे, ऐसे ना सोचा करो।।

अभी बातें बहुत है कहने को, दिल के कुछ राज़ है,
हम तुमसे कुछ छुपायेंगे , ऐसे ना सोचा करो।।

ये साँसें रुकने लगी,जब तुम दूर जो एक पल हुए,
हम तुम बिन जी पाएंगे, ऐसे ना सोचा करो।।

मुहोब्बत तुमसे है मेरी रूह की ,जिस्मो की नहीं,
तुझे छोड़ किसी और को चाहेंगे, ऐसे ना सोचा करो।।

लड़ना,झगड़ना, रूठना,बिगड़ना बस एक शरारत है,
हम वादों से मुकर जायेंगे , ऐसे ना सोचा करो।।

यूँ दिन रात जाग कर गुज़री है ये फिक्र है तेरी,
तुम्हे कभी अनदेखा कर जाएंगे,ऐसे ना सोचा करो।।

"चौहान" के तो हर नज़्म हर गीत में बसी हो तुम,
तेरा ज़िक्र हम ज़ुबाँ पर ना लाएंगे, ऐसा ना सोचा करो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 25 March 2019

"हिसाब-2" (HISAAB-2)


एक दिन तो ख़ुदा तुझसे भी हिसाब माँगूँगा।।
कई सवाल है ज़हन में सबके जवाब माँगूँगा।।

खोल के रख देना चिट्ठा फिर अदालत में तेरी,
फिर सज़ा हो या रिहाई कौरा इंसाफ माँगूँगा।।

ज़्यादा समझ तो नही है मुझे रिश्ते नातों की,
क़र्ज़ सिर है किसी का उसका लिहाज़ माँगूँगा।।

घुट-घुट कर मर गए अरमान  मेरी खामोशियों में,
आज मेरी उन खामोशियों की आवाज़ माँगूँगा।।

कुछ रिश्ते रुहानी बेनाम ही दफ़न हो गए मेरे साथ,
हो उनका भी वज़ूद कोई ऐसे रीति-रिवाज माँगूँगा।।

इन आँखों का शैलाब ना जाने कहाँ बहा ले गया ,
जो डूब कर मर गए मेरे उन ख़्वाबों की लाश माँगूँगा।।

लाश तो बना "चौहान" पर मशानो का ना हुआ,
रास्तों का ही रहने दे मुझे अब ना कोई मुक़ाम माँगूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Thursday, 21 March 2019

"शोहरत" (SHOHRAT)


शोहरत भी कहाँ आसान है,
नाम से ज़्यादा नाम बदनाम है,
हक़ीक़त लिखने की बात करते है,
हकीकत यहाँ पढ़ता कौन है,
हर किसी ने छुपा रखा है चेहरा अपना,
असली चेहरा लेकर मिलता कौन है,
बात करते है असूलों की ,
पर असूलों पर चलता कौन है,
यूँ तो साथ पूरी दुनिया है मेरे,
पर वक़्त आने पर साथ मिलता कौन है,
रिश्ते अब मज़बूरी रह गए है,
जो है वो मतलब से निभा रहे है,
ज़ुबाँ पर शहद लिए फिरते है लोग,
जहाँ काम पड़े वहाँ स्वाद चखा रहे है,
वो दिल से रिश्ते निभाता कौन है,
बेमतलब गले यहाँ लगाता कौन है,
अपनों से दगा कर खुद को शातिर समझते है,
सियासती खेल है हुकुमतों के "चौहान",
वरना गरीबों की बस्ती में जाता कौन है,
मुझसे मेरी औकात पूछते है लोग,
दौलत के पैमाने से मेरा रुतबा नापते है लोग,
बूँद बूँद सैलाब है मेरे हौसलों की,
अंदाज़ा उम्र से लगते है तज़ुर्बा देखता कौन है,
जरूरत नींव को नही होती आशियाने की,
बिना नींव आशियाना बना पाता कौन है,
हौसलों की उड़ान ऊँची रख बादलों से,
फिर देख तेरी मंज़िल से तुझे हिला पाता कौन है,
जिस्मों तक आकर रह गयी मुहोब्बत यहाँ,
वो पाक रूहानी रिश्ते बनाता कौन है,
कसमें,वादे,शर्म,हया इन मे वक़्त जाया ना कर,
आज तू मुहोब्बत में उसका भगवान है,
कल उसका मुर्शद-ओ-पीर कोई और होगा,
मतलब से तो लोग भगवान बदल लेते है,
बेमतलब किसी दर पे सिर झुकता कौन है,
पैसा ही हक़ीक़त है मुहोब्बत की "चौहान",
वो राधा-कृष्ण वाली रंगत चाहता कौन है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 19 March 2019

"होली के रंग" (HOLI KE RANG)


आ ना एक बार फिर मस्ती करते है,
होली के रंग ज़िन्दगी में भरते है।।

फिर वो पिचकारी गुब्बारे लाते है,
फिर बाल्टी रंगों के पानी की भरते है।।

बैठा हूँ इंतज़ार में पहले की तरह बुला,
एक दूजे को गले लगा रंगों में रंगते है।।

बैठेगे फिर से छत पर धूप में थोड़ी देर,
आ ना फिर से झोलियां खुशियों से भरते है।।

फीके पड़े है रंग होली के तेरी याद के आगे,
आ ना इन यादों को हक़ीक़त में बदलते है।।

बहुत आ लिया तो ख़्वाबों में तो मेरे ,
आज आ ना हकीकत में मुलाकात करते है।।

कहाँ फिर ख़ुशियाँ, ख़ुशियाँ लगेंगी "चौहान" को तेरे बिना,
आ ना इन खुशियों का जश्न फिर एक बार करते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 18 March 2019

"मेरी बात" (MERI BAAT)


अभी पढ़ रहा हूँ खुद को,
सीख रहा हूँ खुद से,
जज़्बात छुपा रखे है,
अभी कुछ लिखता नही हूँ।।

तुझे जो मोल भाव करना है,
बेफ़िक्र कर इस बाजार दे,
प्यार है तो जान भी हाज़िर,
पैसों के मोल मैं बिकता नही हूँ।।

पारखी नही ,वाकिफ़ जरूर हूँ,
किरदारों से लोगों के,
हमसफर हूँ इन खाली रास्तों का ,
मंज़िलों पर अब मैं रुकता नहीं हूँ।।

वफादारी अपनो से ही नही ,
मुझे बेगानों से भी है,
हँस लेता हूँ हर एक कि खुशी में,
मतलब के रिश्ते मैं करता नही हूँ।।

विश्वास मेहनत पर रखता हूँ,
मोहताज किस्मतों का नही,
सिर झुकाता हूँ तो बस बंदगी में,
यूँ हर कहीं मैं झुकता नही हूँ।।

कहानी तो अपनी भी लिख दूँ,
पन्ने वक़्त की किताब के फिर पलट दूँ,
मुहोब्बत ईमान है मेरा"चौहान",
हर किसी के रंगत में रंगता नही हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 15 March 2019

"बचपन-2" (BACHPAN-2)


बस एक बार फिर मुझे उसी बचपन मे जीना है,
किसी का खिलौना बनना है खिलौनों से खेलना है।।

एक बार फिर माँ के आँचल में सोना है,
पापा के कंधे चढ़ फिर मेला देखना है।।

वो परेशान भी करना है शरारतों से अपनी,
दादा- दादी से फिर उन कहानियों को सुनना है।।

फिर से वो असली मुस्कान चहरे पर लानी है,
फिर कुछ पाने के लिए झूठ-मुठ का रोना है।।

चलना सीखना है फिर से पकड़ के उंगली पापा की,
 माँ गा के सुलाती थी जो उन लौरियो को सुनना है।।

बिन बात हँसना है तो बिन बात रोना है,
फिर एक बार उस बेफिक्री में मस्त होना है।।

फिर ज़िद्द करनी है वो नानी घर जाने की,
फिर मामा के साथ जा कर खिलौने लेकर आना है।।

एक बार फिर उस हक़ीक़त से गुजरना है,
जैसा अंदर से हूँ "चौहान" वैसा ही बाहर दिखना है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 13 March 2019

"मेरी माँ" (MERI MAA)




वो शब्द जिसमे बसता ये सारा जहाँ है,
वो जिसके आगे सिर झुकाता खुद खुदा है,
वो जिसकी ममता भगवान भी ना खोना चाहे,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।

नो माह कोख़ में रख कितना दर्द उठाती है,
खुद गीले में सो हमे सूखे में सुलाती है,
अपने हिस्से की रोटी भी जो हमें खिलाती है,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।

जिसके आँचल में सुकून की नींद आती है,
सुखी रोटी भी उसके हाथ की हर स्वाद दे जाती है,
कभी कभी जो डाँट फटकार कर प्यार जताती है,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।

मेरी चोट से आँखें जिसकी नम हो जाती है,
मेरी फिक्र में जिसे रातभर नींद ना आती है,
जो हर कदम पर मेरे साथ खड़ी पाती है,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।

जिसमें मूरत खुदा की नज़र आती है,
जो उपवास कितने मेरी ख़ातिर कर जाती है,
जिसके पैरों में "चौहान" ज़न्नत नज़र आती है,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 12 March 2019

"अच्छा होता" (ACCHA HOTA)


काश ये बात ना बताते तो अच्छा होता ,
वो चुप चाप चले जाते तो अच्छा होता ।।

हम तो समझ गए थे कि हमारे नही अब वो,
वो ये एहसास ना करवाते तो अच्छा होता।।

क्या होता 'गर गुज़र जाती रातें ओर अंधेरे में तन्हाई में,
तूफानों में मुहोब्बत का दिया ना जलाते तो अच्छा होता।।

काफ़िर बन बैठे तो क्या मुसाफ़िर तो थे,
मंज़िल तुझे ना बनाते तो अच्छा होता ।।

मोहताज़ नही है हम आज भी मुहोब्बत के तेरी,
पर काश दिल पत्थर से लगाते तो अच्छा होता।।

ख्वाइशें तो ना जाने कितनी मरी थी हमारी "चौहान",
दिल-ए-ज़मी को शमशान ना बनाते तो अच्छा होता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 9 March 2019

"हमारी अधूरी कहानी"(HAMARI ADHURI KAHANI)


वो कहती है मुझसे के कोई इश्क़ की कहानी लिखो,
अपनी हो या बेगानी पर मुहोब्बत-ए-रूहानी लिखो।।

वो जो ना जाने कितनी यादें कर गयी नाम हमारे,
कभी तो ढलती शामों की मुलाक़ात पुरानी लिखो।।

मत लिखना वो छुप-छुप कर रातों को मिलना हमारा,
चाँद को देखकर निकल गयी वो रात मस्तानी लिखो ।।

मत लिखना वो कसमे वादें मुहोब्बत के हमारे तुम्हारे,
जो अब तक संभाल रखी है वो प्रेम-निशानी लिखो।।

दबी बातों को कुरेद मत देना जज़्बातों में बह के,
वो नही कहती "चौहान" हमारी अधूरी कहनी लिखो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Thursday, 7 March 2019

"मैं आऊंगा लौट के" (MAIN AAUNGA LAUT KE)


मैं आऊँगा लौट के ,
तुम विश्वास रखना,
दरवाजे खुले रखना,
मेरी राह तकना,
मैं आऊंगा लौट के.....

तेरे आँचल में मुझे फिर सोना है,
तेरे सीने से लग के फिर रोना है,
फिर सताऊँगा तुझे मैं दिन रात,
मेरे लिए फिर सारी सारी रात जगना,
मैं आऊँगा लौट के....

अपने हाथों से फिर खाना खिलाना,
लौरी मुझे फिर गा के मुझे सुलाना,
रहूँगा जब जब देर रात घर से बाहर,
मेरी फिक्र में फिर राह तकना,
मैं आऊँगा लौट के....

फिर उसी आँगन में खेलना है,
फिर तेरे पैरों के झूलों पर झूलना है,
फिर देखना है मेला तेरे कंधे चढ़ के,
मेरे लिए फिर खिलौने खरीद के रखना,
मैं आऊँगा लौट के......

फिर शरारत करके तुझे सताऊँगा,
हर पल में तेरे साथ खड़ा पाउँगा,
फिर से आऊँगा सूनी कलाई लेकर,
राखी मेरे लिए फिर तैयार रखना,
मैं आऊँगा लौट के....


फिर तेरी रातों में लौट आऊँगा,
फिर तुझे सीने से लगाऊँगा,
पूरे करूँगा ख़्वाब जो टूट गए,
मेरे नाम से नाम अपना जोड़ के रखना,
मैं आऊंगा लौट के......

फिर तुझे अपना हमराज़ बनाउँगा,
अपने सारे ख़्वाब तुझे बताऊँगा,
फिर मिलेंगे उन्हीं जगहों पर एक बार,
पहले की तरह थोड़ा इंतज़ार करना,
मैं आऊँगा लौट के....

अब ये दोस्ती तोड़ के ना जाऊँगा,
बीच राह में छोड़ के ना जाऊँगा,
मैं भी पढूंगा तेरे साथ बैठकर,
कविताओं में "चौहान" मेरा ज़िक्र रखना,
मैं आऊँगा लौट के......

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 4 March 2019

"तेरी दुनिया" (TERI DUNIYA)


ख़्वाब क्या मैं तो खुद को भी तोड़ चुका हूँ,
तेरा शहर क्या तेरी दुनिया भी छोड़ चुका हूँ।।

जिसमें देख खुद में नज़र आते थे तुम,
आज दर्पण वहम का भी तोड़ चुका हूँ।।

वो जो बाहें जिनमें गुज़री थी रातें मेरी,
देख उस आग़ोश को भी छोड़ चुका हूँ।।

सच कहते थे कि धागे कच्चे है प्यार के,
आ देख नाता ज़िंदगी से तोड़ चुका हूँ।।

रातभर घुमता हूँ शमशानों में "चौहान",
गला अपने सपनों का घोंट चुका हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 2 March 2019

"कहानी"(KAHANI)


किरदार बदले है कहानी वही है उसकी मुहोब्बत की,
हक़दार बदले है निशानी वही है उसकी मुहोब्बत की।।

क्या हुआ गर आज कोई और है वहाँ जहां कल तुम थे,
तरफ़दार बदले है रवानी वही है उसकी मुहोब्बत की।।

एक छलावा है सब चहरे की सिकन झूर्रियां उसके,
वक़्त बदला है जवानी वही है उसकी मुहोब्बत की।।

देख के रोशनी आफ़ताब की मोड़ लेते है मुँह चिरगों से,
जरूरत सही पर बेईमानी वही है उसकी मुहोब्बत की।।

आज भी लिफाफों में बंद पड़े है ख़त मुहोब्बत मेरे,
शर्म हया नही आदत ये पुरानी है उसकी मुहोब्बत की।।

तू खून से लिख "चौहान" या अश्क़ पानी से कोई फर्क नही,
नियत जमाने से जानी पहचानी है  उसकी मुहोब्बत की।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...