रूठ सा गया हूँ ,तुझसे ए ज़िंदगी ,
टूट सा गया हूँ मैं अभी-अभी ।।
दिल रो रहा है पर आँखों में आंसू नहीं ,
कैसे समझाऊ दिल को खुद पर भी काबू नहीं ।।
अजीब खेल है खुदा का भी , जिस से प्यार है उसे पास लता नहीं ,
तुझसे नफरत है तो तुझे मुझसे दूर ले जाता नहीं।।
देख हालत मेरी मुझे तो समझ आती नहीं ,
"चौहान" आँखों में नमी है चेहरे पर हसीं।।
मंज़िल तो मौत है फिर क्यों चला जा रहा हूँ तेरे संग बेवजा युहीं ,
क्यों लिए फिर रहा हूँ एक उम्र भर की तन्हाई और बेबसी ।।
रूठ सा गया हूँ ,तुझसे ए ज़िंदगी ,
टूट सा गया हूँ मैं अभी-अभी ।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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