Tuesday, 4 July 2017

"ए ज़िंदगी " ( AE ZINDGI)


रूठ सा गया हूँ ,तुझसे ए ज़िंदगी ,
टूट सा गया हूँ मैं अभी-अभी ।।

दिल रो रहा है पर आँखों में आंसू नहीं ,
कैसे समझाऊ दिल को खुद पर भी काबू नहीं ।।

अजीब खेल है खुदा का भी , जिस से प्यार है उसे पास लता नहीं ,
तुझसे नफरत है तो तुझे मुझसे दूर ले जाता नहीं।।

देख हालत मेरी मुझे तो समझ आती नहीं ,
"चौहान" आँखों में नमी है चेहरे पर हसीं।।

मंज़िल तो मौत है फिर क्यों चला जा रहा हूँ तेरे संग बेवजा युहीं ,
क्यों लिए फिर रहा हूँ एक उम्र भर की तन्हाई और बेबसी ।।

रूठ सा गया हूँ ,तुझसे ए ज़िंदगी ,
टूट सा गया हूँ मैं अभी-अभी ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...