Wednesday, 30 May 2018

"लौट के आ जाते -3" (LAUT KE AA JATE-3)


कहकर तो देखा होता राह में तेरी जान भी बिछा जाते ,
क्या होता जो घड़ी भर को तुम लौट के आ जाते।।

मुंतज़िर थे हम तो कबसे उस रात के जो गुज़रे तेरे साथ,
चाँद तारे ना सही जुगनुओं से मेरी राहें सजा जाते ।।

खोंफ़-ज़दा थे हम तो तुमसे दूरियों को लेकर,
उम्र भर ना सही दो कदम तो साथ निभा आते ।।

बोला तो होता के इश्क़ की कीमत जान है हमारी,
ज़रा इशारा करते हम खुद खंज़र-बदस्त हो आते।।

कोई गिला ना रहता फिर हमें 'गर इस दिल-ए-गुलिस्तां में,
रुत फ़िज़ाओं वाली ना सही खिज़ा बनकर ही आ जाते।।

हर्फ़-हर्फ़ लिखा है चौहान ने अपना लहू भर तहरीर में ,
मेरे दिल की दीवारों से वो अपना नाम ही मिटा जाते ।।

क्या होता जो घड़ी भर को तुम लौट के आ जाते।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 27 May 2018

"बहु बेटी नहीं होती" (BAHU BETI NHI HOTI)


थोड़ी उलझन है कही बातों की ,
शायद ही सबको समझ आएगी ।।

हुई बात पक्की तो लड़के की माँ बोली,
बहु नही हमारी बेटी बनकर घर आएगी।।

बाप ने विदा कर बेटी को उनकों सौप दिया,
क्या पता था सास कहीं अपनी बात भूल जाएगी।।

उसके लिए तो सब जैसे एक सपना-सा था,
पता ज़रूर था के यही अब ये उम्र गुज़र जाएगी।।

बेगाना था अब वो आँगन जिसमे बचपन गुज़रा था,
किसने सोचा के वो यादें कैसे भूला पाएगी ।।

सास को माँ ,ससुर को बाप, मान कर आई थी जो,
कभी सोचा ही नही यहां बस परायी बनकर रह जायेगी।।

घर वाले तो होंगे पर अब वो मनमर्ज़ी ना होगी,
कहाँ ना जाने वो अपने सपनो की कब्र बनाएगी ।।

बेटी होती तो शायद आराम भी कर लेती ,
बहु है सब काम करके ही खाना खायेगी ।।

नज़रअंदाज़  होंगी तो बस वो गलतियां बेटी की ,
बहु है बिना गलती भी सहमी सी नज़र आएगी।।

तरसेगा मन उसका भी घर अपने जाने को फिर,
बिना इज़ाजत वो एक कदम भी बढ़ा ना पाएगी ।।

सोचती होगी वो भी मन मार के फिर अपना ,
के बेटी थोड़ी हूँ जो महीनों भर रुक जाएगी।।

लाज माँ-बाप की रखने की खातिर,
सारी ख्वाइशें अपनी  मार गिराएगी ।।

घूँट सब्र का फिर पीना पड़ेगा ज़हर सा "चौहान",
ये सोच के ख़ामोश है शुरुवात है आदत पड़ जाएगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Thursday, 24 May 2018

"हकीकत" (HAQIQAT)


आज बात इश्क़ की करते है वो ,
जिस्म की ख़्वाईश रखते है जो ।।

इंसानियत बेच कर आये है ,
धर्म के ठेकेदार बनते है जो ।।

कहाँ झुकते है सिर किसी दर पर,
बात मज़हब की करते है जो।।

सच की रोशनी से डरते है वो,
झूठ के अंधेरे में पलते है जो ।।

अपना ज़मीर तक बेच कर बैठे है अपनी ,
झूठी इज़्ज़त का दिखावा करते है जो ।।

नक़ाब पहन रखते है मासूमियत का ,
हैवानियत की आग में जलते है जो।।

जीने की ख़्वाईश ना कर "चौहान" आईना सच का दिखाकर,
रातों-रात दफ़न हो जाते है यहाँ सच उगलते है जो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।






Sunday, 20 May 2018

"आईना - एक सच " (AAINA - EK SACH)


देखो ये आईना है सब सच बताता है ,
ज़ुबाँ नही है इसकी पर सब कह जाता है ।।

सब देख कर भी अनदेखा कर देते है लोग यहाँ ,
खुद पर गुज़रे तो अंधे को भी नज़र आता है ।।

बनाने वाले को गुरुर नही करसाज़ी पर अपनी,
चंद तमाशे दिखा इंसानों को खुद में भगवान नज़र आता है।।

आजकाल कौन किसकी खुशी देखकर खुश है यहाँ,
वक़्त पड़ने पर तो गधे में भी इन्हें बाप नज़र आता है।।

सच्चाई की सरबत कौन पीना चाहता है जनाब,
इनके लिए वही अच्छा है जो झूठ का ज़हर पिलाता है ।।

बुराईयां सबकी नजर आती है आजकल सबको यहां,
खुद के दामन में कितने दाग है को जानना चाहता है ।।

गिन-गिन के हिसाब लेगा वो अदालत में अपनी ,
ख़ामोश ज़रूर है वो पर तेरी रग-रग पहचानता है ।।

तेरी उम्र से अंदाज़ा लगते है "चौहान" लोग तेरी उड़ान का,
नही जानते वक़्त का सिखाया है अपनी हद्द पहचानता है ।।

ख़ामोश रहने दो तुम "चौहान" को और उसकी कलम को,
बेवकूफ है जब भी बोलता है पागल सच बोल जाता है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 16 May 2018

"हमारी बेटियाँ-हमारी सोच" (HAMARI BETI HAMARI SOCH )


कब तक दुनिया के झूठे रिवाज़ो में पिसती जाएगी,
हाथ पैर बाँध कर कहते है बेटी मेरी दौड़ के दिखाएगी।।

कोशिश कभी की ही नही ख़्वाईश जानने की उसकी ,
पँख नोंच कर कहते है देखना अभी उड़ कर दिखाएगी।।

कपड़ों से नापी जाती है अब तो इज्ज़त यहाँ पर,
साड़ी में बदन दिखाएगी तो संस्कारी कहलाएगी ।।

करेगी सपने पूरे अपने माँ बाप के इस देश की बेटियां
"चौहान" पर खुद के सपनो की लाश कहाँ दफ़नाएँगी।।

होश है हालातों का पर किनसे है ये होश नही ,
ज़िंदा ही कभी थी बेटी जो डर हो के कहीं मर जाएगी।।

ख़्वाब तू भी देखना और पूरे करना मगर शादी के बाद,
अमानत परायी है यहां तो बस कुछ वक्त ही बिताएगी ।।

कहने को कंधे से कंधा मिलाएगी लाडो मेरी लड़को से ,
पर इस आँगन की तुलसी आँगन से बाहर ना जाएगी ।।

माँ ,बेटी, बहु  बहन ,बहुत से किरदार निभाएंगी ,
खुद का अस्तित्व मिटा तू कहाँ तक जीती जाएगी।।

कहाँ फर्क पड़ेगा "चौहान" तेरी बातों का ज़माने पर,
ना समझ है जब खुद पर गुज़रेगी तब समझ आएगी ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 14 May 2018

"मेरी पहचान - मेरे पापा" (MERI PEHCHAAN - MERE PAPA)


माना दिखाते नही है वो प्यार जताते नही है ,
जज़्बातों को आंखों से कभी बहाते नही है ।।

मुझे हर खुशी देने की ख़्वाईश लिए जीते है ,
अपनी परेशानियों को चहरे से झलकाते नही है ।।

भूल जाते है अपना हर सुख मेरे सुख के आगे ,
कैसे रखतेे है ना जाने इतनी बात दिल मे छुपा के ।।

करते है गुस्सा मुझपर वो ना जाने कितनी दफा,
पर कोई और मुझे बोले ये ज़रा भी सह पाते नही है ।।

मेरे ख़्वाबों को हकीकत बनाने की कोशिश करते है,
खुद के कितने ख़्वाब दफ़न है कभी जताते नही है ।।

अपने सपनों को मार कर मेरे सपनों में जीते है ,
मेरे कल की सोच कर वो आज में भी जी पाते नही है।।

हर मुश्किल में मेरे साथ आ खड़े हो जाते है ,
अपने माथे की सिकन कभी किसी को दिखाते नही है।।

होंगे इंसान दुनिया की नज़र में वो पर सच है,
"चौहान" को तो भगवान से कम नज़र आते नहीं हैं।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 13 May 2018

"मेरा सच - मेरी कहानी" (MERA SACH - MERI KAHANI)


अमीर भी हूँ और फ़क़ीर भी ,
ज़िंदा भी हूँ और तस्वीर भी ।।

चुप रहता हूँ पर अल्फ़ाज़ों से बोलता हूँ,
खुद से ही अपनी औकात टटोलता हूँ।।

हसरतें इतनी है के आसमान भी छोटा पड़ जाए,
ज़रूरत से नहीं ख़्वाईश से अपने पंख खोलता हूँ।।

अच्छा नही लगता लोगों को मेरा अंदाज़-ए-गुफ्तगू,
जो बोलता हूँ सबके मुँह पर बोलता हूं ।।

कई राज दफ़न है मुझमे मेरे  ,
कई राज है जो कलम से खोलता हूँ।।

हार-जीत का फर्क नही पड़ता अब मुझे,
वक़्त की ठोकरें खा हालातों से सीखाता हूँ ।।

नफ़े नुकसान की परवाह कभी करता नही ,
मेरी माँ के सिखाये उसूलो पर जीता हूँ।।

कभी वक़्त मिलेगा तो  बताऊंगा तुम्हे भी मैं,
"चौहान" ज़िद्द है वो मेरी मरकर भी उसमें जीता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Saturday, 12 May 2018

"माँ" (MAA)


वो रातों की मीठी मीठी लौरी,
फिर से माँ गा के सुना दे।।
थक गया हूँ ज़िन्दगी की राह में ,
फिर से तेरे आँचल में सुला ले।।
फेर दे माँ हाथ तेरा माथे पर मेरे ,
माथे की सिकन को आके तू मिटा दे ।।
थक गया हूँ जाग-जाग के मैं,
थक गया हूँ भाग - भाग के मैं,
आके अपने बेटे को माँ सीने से लगा ले ।।
भूख भी तो माँ अब लगती नही है ,
आज तेरे हाथोँ मुझे खाना खिला दे ।।
शरारतों को मेरी नज़रन्दाज़ मत कर ,
आज फिर से वो मीठी -सी डाँट लगदे।।
हर वक़्त तो संभाला है तूने "चौहान" को,
ज़िन्दगी जीने का माँ एक सलीका और सीखा दे।।
वो रातों की मीठी मीठी लौरी,
फिर से माँ गा के सुना दे।।
थक गया हूँ ज़िन्दगी  की राह में,
फिर से तेरे आँचल में सुला ले ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 6 May 2018

"कहानी" (KAHANI)


झूठी है या सच्ची है ,
ये अपनी कहानी  है,

ये तन्हाई  का आलम ,
ये बेबसी का मौसम,
जो यादें संभाली है ,
ये अपनी निशानी  है ,
झूठी है या सच्ची है ,
ये अपनी कहानी है ,

रातों को जागना,
सजदों में मांगना,
जिस्मानी नही महोब्बत,
ये अपनी रूहानी है ,
झूठी है या सच्ची है ,
ये अपनी कहानी है,

बोल के बता ना सके ,
आंखों से छुपा ना सके,
ख्वाइशें मेरी वो दफन,
मुझमे ही हो जानी है ,
झूठी है या सच्ची है ,
ये अपनी कहानी है,

ये जो दर्द में सुकून है ,
ये जो इश्क़ का जुनून है,
एक आग है जिसमे चौहान,
हस्ती तेरी भस्म हो जानी है ,
झूठी है या सच्ची है ,
ये अपनी कहानी है,

शुभम् सिंह चौहान,
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।






Saturday, 5 May 2018

"एहसास" (EHSAAS)


जब से तुझे मेरे ज़िस्म ने रूह सा बना लिया ,
 खुशियों ने तो जैसे मुझसे नाता ही छुड़ा लिया ।।

 गुरुर होने लगा तुझे मेरी मुहोब्बत का खुदपर,
 मेरे अरमानों ने मेरे दिल को शमशान बना दिया।।

खुले आसमान की ख़्वाईश ले के जीता था कभी,
आज बंद कमरे को ही अपना जहाँ बना लिया ।।

कभी मुस्कान नही हटती थी चहरे से जिसके आ देख,
लबों पर खामोशी और आंखों को समन्दर बना लिया।।

इतनी शिद्दत से इबादत तो खुदा भी क़बूल कर लेता,
क्या पता था किसी पत्थर को भगवान बना लिया ।।

हासिल भी क्या होता मुझे दर्द-ए-मुहोब्बत के सिवा,
क्या हुआ उसके दिए ज़ख़्मो को नासूर बना लिया।।

भर लिया हमने तेरे दर्दों-गम से आज दामन अपना ,
खुश है के अपनी खुशियों से तेरा आँगन सजा दिया।।

अंज़ाम पता था हमे मुहोब्बत का अपनी बस इसलिये,
तेरे शहर से आशियाना अपना हमने  ख़ुद जला दिया।।

सिर्फ अल्फ़ाज़ पढ़ती है ये दुनिया तेरे "चौहान",
क्या पता के एहसासों को तूने दिल मे ही छुपा लिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 1 May 2018

"एक किताब" (EK - KITAB)


एक किताब लिखुँगा,
कुछ वादे , कुछ हिसाब लिखुँगा।।
जो टूट कर बिखर गए मेरे ,
वो सारे ख़्वाब लिखुँगा ।।
लिखुँगा बेपरवाही किसी की ,
किसी के दर्दों का जवाब लिखुँगा।।
लिखुँगा तेरे दामन की खुशियां सारी,
मेरे जिस्म पर ज़ख्मों का लिबाज़ लिखुँगा।।
नही लिखता अब कहीं नाम तेरा ,
पर तेरा ये मुहोब्बत-ए-अंदाज़ लिखुँगा।।
नासूर बन कर रह गए जो इस दिल पर ,
तेरी दी वो सारी इश्क़-ए-सौंगत लिखुँगा।।
मंज़िल तक मेरे साथ आना तो दूर ,
जो बीच राह में छुड़ा गए वो साथ लिखुँगा ।।
नही लिखता दिन की बेचैनी ,रात की तन्हाई ,
पर जो तूने कही हर वो बात लिखुँगा ।।
माना अब नही होती शाम ज़िंदगी मे ,
पर हर शाम तुझसे हुई मुलाकात लिखुँगा।।
जब रह जायेगा आखिरी पन्ना किताब का,
"चौहान" इस कहानी की एक नई शुरुआत लिखुँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...