अकेला इस लिए नही हूँ कि मुझे तुम नही मिले,
अकेला इसलिए हूँ मुझे कोई साथ तुमसा ना मिला।।
वापिस इसलिए नही मुड़ा के मंज़िल को मैं पा नही सकता,
लौटा तो इसलिए के सफर ने हमसफ़र तुमसा ना मिला।।
जानना चाहती हो कि क्यों कह ना सके ये लब कुछ,
खामोश इसलिए हूँ सुनने वाला कोई तुमसा ना मिला।।
कौन सुनता कहानी इस अदालत में वफ़ा-ए-इश्क़ की,
बताते भी तो कैसे कोई तरफ़दार तुमसा ना मिला।।
और किस से पूछते वजहा दूर जाने की या इश में बेईमानी की,
"चौहान" मौत को गले लगा जीने वाला खुद्दार तुमसा ना मिला।।
मिले होंगे लाखों इस दुनिया की भीड़ में तुम्हे भी हमे भी,
पर कोई हदों से गुज़र प्यार करने वाला तुमसा ना मिला।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
No comments:
Post a Comment