इश्क़ तुझसे किया तो क्या गुनाह किया ,
जितना जिया तुझमे जिया तो क्या गुनाह किया ।।
क्या करूँ अगर आता नहीं ख्याल किसी और का ,
जब भी लिया नाम तेरा लिया तो क्या गुनाह किया ।।
सफर में तुम भी थे सफर में हम भी थे ,
तुझे मंज़िल बना के चला तो क्या गुनाह किया ।।
उदासी तो रहती है आज भी इस चेहरे पर ,
तेरी ख़ुशी में थोड़ा हंस लिया तो क्या गुनाह किया ।।
तुम पूछो ना पूछो हाल -ए-दिल मेरा ,
करली जो थोड़ी फ़िक्र तेरी तो क्या गुनाह किया ।।
क्या हुआ जो तुम मिल न सके हमे इस ज़िंदगी में ,
तुम्हे ज़िंदगी बना के जिए तो क्या गुनाह किया ।।
क्या हुआ तुझे अगर क़बूल नहीं "चौहान",
तुझसे चाहत नहीं तेरी इबादत की तो क्या गुनाह किया।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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