Tuesday, 3 October 2017

"बीते-दिन " (BEETE DIN)


मिली थी नज़रें तो थम सा गया था वक़्त ,
ना होश था खुद का ना कोई थी खबर ..
नज़रे चुरा के तू भी देखा करती थी ,
बात करने के बहाने तु भी ढूंढा करती थीं ..
मेरी ख़ामोशी तक पढ़ लेती थी जब तु,
क्या वो बीते दिन याद हैं तुम्हे..
वो सावन की पहली बारिश में साथ मेरे भीगना ,
वो लंबे रास्तों पर तेरा हाथ थामे चलना ,
वो मुझे मिलने को पल पल मचलना ,
वो खुद से भी ज़्यादा मेरी फ़िक्र करना ,
वो तेरे संग गुज़री थी जो शाम ,
क्या वो बीते दिन याद है तुम्हे...
तेरा वो बारिश में मेरे संग भीग जाना ,
वो बिजलियों की खड़खड़ाहट से मेरी बाँहों में सिमट जाना ,
तेरा वो अपने हाथों से खिलाना ..
क्या वो बीते दिन याद है तुम्हे ....
तेरा वो मेरी आदतों में ढल जाना ,
तेरा यूं मुझे पल पल रुलाना ,
तेरा वो बीच सफ़र में छोड़ जाना ,
"चौहान " की जान बन के निकल जाना ..
तेरी हर सजा हर सितम  याद है मुझे पर ,
क्या वो बीते दिन याद है तुम्हे ...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां



No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...