Wednesday, 28 February 2018

"मैं ना रहा" (MAIN NA RHA)


अगर मैं ना रहा ,तुझमे क्या बाकी तेरा होगा ।
सोच के तो देख मुझबिन कैसा तेरा सवेरा होगा ।।

कैसे छुपाओगी उदासी अपने इस चेहरे से ।
जब तेरे दिल-ओ-दिमाग पर मेरी यादों का पहरा होगा ।।

सोच कैसे गुज़रेगी रातें तेरी मेरे बिन ।
जब तुझे बस तन्हाइयो  ने घेरा होगा ।।

कैसे मिलोगी आँखें तुम किसी से मेरे बाद ।
जब हर कहीं देता दिखाई मेरा ही चेहरा होगा ।।

कैसे मानोगी की ज़िन्दगी है अब मेरे बिन ।
जब तेरे दिल की दीवारों पर अक्ष मेरा होगा ।।

कहाँ फिर किसी दर से मांग पाओगी मुझे तुम ,
"चौहान" का जब दूर तारों में बसेरा होगा ।।

कहाँ लिख पायेगा फिर कोई " मेरी कलम-दिल की ज़ुबाँ"।
जब तेरी दुनिया में कोई वजूद ही ना मेरा होगा ।।

"शुभम् सिंह चौहान"
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

"मुसाफ़िर" (MUSAFIR)


इस दुनिया में सब मुझें मुसाफिर नज़र आते है ।
जहाँ तक देखूं मुहोब्बत में सब काफिर नज़र आते है ।।

कोई मंदिर में तो कोई मस्ज़िद में कर रहा है सज़दे ।
हर तरफ लोग किसी की चाहत के मुतासिर नज़र आते है ।।

कोई किसी को मिल गया तो कोई किसी से हो गया जुदा।
कहीं हसीं तो कहीं प्यार में खौफ़नाक मंजर नज़र आते है ।।

कहीं आँखों में गम के तो कहीं आँसू है ख़ुशी के ।
हर तरफ यहाँ अश्क़ों के समुन्दर नज़र आते है ।।

"चौहान" क्या मिलेगा तुझे लिख-लिख के यूँ हाल-ए-दिल।
मुहोब्बत में अक्सर लोगों को खुद में सिकंदर नज़र आते है ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 23 February 2018

"मांगोंगे हमें" (MANGONGE HAMAIN)


सताएंगी जब रातें तन्हा, तब मांगोंगे हमें ,
रुलायेंगी यादें लम्हा-लम्हा, तब मांगोंगे हमें।।

दिल होगा बेचैन सहमा-सहमा , तब मंगोंगे हमें ।
तड़पाएगा जब ये आलम ये समां , तब मांगोंगे हमें ।।

पाओगे खुद को जब  हर कहीं अकेला, तब मांगोंगे हमें ।
मिलेगा जब न कहीं खुशियों का मेला ,तब मंगोंगे हमें।।

आज रहमत थी खुदा की के पास थे हम उनके।
जब ना रहेंगे इस जहाँ में ,तब मंगोंगे हमें।।

जब ना हम होंगे ना मेरी कलम ,तब मांगोंगे हमें ।
जब ना आ सकेगा लौट के "चौहान", तब मंगोंगे हमें।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 22 February 2018

"अच्छा लगता है" (ACCHA LAGTA HAI )


अच्छा लगता है तेरा बिन बताये यूँ फिकर करना ।
अच्छा लगता है तेरा मेरे संग यूँ बेफिक्र चलना ।।

अच्छा लगता है तेरा मेरे ख़्वाबों में आना ।
अच्छा लगता है तेरा मुझमे कहीं खो जाना।।

अच्छा लगता है हरपल तुझे खुद के साथ पाना ।
अच्छा लगता है तेरी बातों में मेरा ही ज़िक्र आना ।।

अच्छा लगता है सबसे छुप के मुझसे मिल जाना ।
अच्छा लगता है तेरा सब आँखों में ही समझ जाना।।

अच्छा लगता है तेरा रूठ के मुझको मनना।
अच्छा लगता है तेरा दिल को तड़पना ।।

अच्छा लगता है अश्क़ों को तेरी यादों में बहाना।
अच्छा लगता है तेरे ग़मों को सीने से लगाना।।

एक कलम बस लिखती है तेरे इश्क़ के फ़साने ।
अच्छा लगता है "चौहान" के जिस्म में तेरा रूह सा पाना ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Tuesday, 20 February 2018

"तुम " (TUM)



आँखों ने पढ़ी आँखों की ये ज़ुबाँ,
मर जायेंगे इक पल भी हुए तुझसे जुदा।।

सांसें जब मिली तेरी सांसों से तो पता चला ,
क्यों रहते थे सदा हम खुद से ही जुदा।।

आज जब नाम लिया तेरा इन लबों ने ,
पता चला के क्यों ख़ामोश रहते थे ये सदा।।

आज जब थामा तेरे हाथों को हाथों में ,
तो पता चला क्या ढूँढती थी ये लकीरें सदा।।

कभी नही देखा था इतना ग़ौर से किसी को,
आज देखा खुद में तो पता था मुझमे ही थे तुम सदा।।

मेरे अलफ़ाज़ रहते थे जुदा-जुदा से खुद मुझसे ही  ,
ज़िक्र आया तेरा तो पता चला के क्यों कहता था "चौहान" शायर तुझे जहाँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Friday, 16 February 2018

मेरे क्या हो तुम ??? (MERE KYA HO TUM)


सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??

रिश्ता ये अंजाना  सा है ,
फिर भी जाना पहचाना सा है ,
जिसे सोचता हूँ मैं हर घड़ी,
वो ख्वाब एक पुराना सा है ।।

यूँ तो दो जिस्म है अलग अलग हमारे ,
पर मेरे जिस्म में रूह सी शामिल हो तुम ,
यूँ तो माना के दूर हो मुझसे ,
पर हर एक लम्हे में मुझे हासिल हो तुम ,

सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??

गर एक ख्वाब हूँ तो मेरी आरजू हो तुम ,
गर हकीकत हूँ तो मेरा अस्तित्व हो तुम ,
एक पल भी जीना ग़वारा नही बिन तेरे ,
मेरे जिस्म में आती जाती साँसे हो तुम ,

सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??

मैं साज़ हूँ तो मेरी आवाज़ हो तुम ,
मैं गीत हूँ तो मेरा राग हो तुम ,
बहुत अधूरा सा हूँ मैं बिन तेरे ,
मेरे जीने का अंदाज़ हो तुम ,

सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??

तुझ बिन जीना तो सज़ा सा लगता है ,
मुझे तो तू मेरा खुदा सा लगता है ,
जी करता है तेरे सज़दे में मर जाऊँ,
बेगाना अब तो ये जहाँ सा लगता है ,

मैं राही मेरा मुकाम हो तुम ,
मेरे इश्क़ का अंजाम हो तुम ,
मेरे दिन रात सब तुझसे है ,
मेरी कभी न ढलने वाली शाम को तुम ,

सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??

मैं मूर्त मेरे कारसाज़ हो तुम,
मैं अनकही बात मेरे अल्फ़ाज़ हो तुम ,
बस इतना समझ आता है "चौहान" को तो
मैं अंत मेरा आगाज़ हो तुम ...

सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Friday, 9 February 2018

"मेरा प्यार " (MERA PYAR )


सोचता हूँ के कुछ ना कहूँ तुमसे , मुझे छुपाना नही आता ,
कैसे बताऊं तुम्हे हाल-ए-दिल ,मुझे बताना नही आता ।।

यूँ तो सब बयां कर देती है मेरी ये खामोश आँखें ,
कैसे बोलूँ एहसासों को अल्फ़ज़ाओं में पिरोना नही आता ।।

हर कही अब तेरा अक्ष दिखाई देता है मुझे ,
कैसे बोलू इस दिल को अब तौर तरीका ज़माने का नही भाता,

तेरी काली ज़ुल्फों की घनी छावं में अब बितानी है रातें मेरी ,
कैसे बोलूँ अब रात का तारों भरा आँचल नही भाता ।।

गम तेरे सारे रख लूंगा समेट के अपने अंदर ,
कैसे बोलूँ तेरे बिन खुशियों से अब नाता समझ नही आता ।।

माना के नहीं पता मुझे तौर तरीका मुहोब्बत करने का ,
कैसे बोलूँ तेरे बिना अब मंज़िल दूर रास्ता भी नज़र नही आता।।

हर्फ़ हर्फ़ लिख देगा "चौहान" अपने जज़्बात खून से ,
कैसे बोलूँ के तेरे बिना मुझे तो जीने का सलीका भी नहीं आता ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Sunday, 4 February 2018

"अकेली तन्हा रात " (AKELI TANHA RAAT )


एक अकेली तन्हा रात में  ,
तेरी यादों को साथ लिये,
देख के उस चाँद को,
अक्ष तेरा ढूंढता हूँ,
अपनी इन आँखों में,
 कुछ भीगे जज़्बात लिए।।

ना चाहत दौलत शोहरत की  ,
क्या करना महल आटारी का,
खुद को राख बनाना है ,
तेरी रूह में सामने के लिए !!

जाके वहां तुझसे पहले ,
करके रुक्सत इस दुनिया को ,
इश्क़ का सेहरा बांध के बैठा,
तेरे मिलान की चाहत लिए!!
जहाँ न जात-पात की बेड़ी हो,
ना बंधन झुठे इन् रिवाजों के ,
"चौहान" मिटा चला है खुद को ,
कहानी प्रेम मिलन की पूरी करने क लिए !!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

"एहसास" (EHSAAS)


इन हवाओं में तेरी नमी का एहसास है,
इन बारिशों में तेरी कमी का एहसास है !!

इन घटाओं को तेरी घनी ज़ुल्फों की तलाश है ,
इन बादलों में तेरे सुर्ख लबों की प्यास है !!

इस समुंदर को तेरी आँखों में सिमटने की आस है  ,
इन फ़िज़ाओं में घुलती जैसे तेरी हर सांस है  !!

मेरे अलफ़ाज़ तेरे लबों को चूमने को बेताब है ,
तेरे चहरे के नूर के आगे फीका आफताब है !!

मेरी कविताओ में तेरे प्यार का एहसास है  ,
तू चाहे कहीं भी रहे "चौहान " के जीने की आस है !!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...