सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??
रिश्ता ये अंजाना सा है ,
फिर भी जाना पहचाना सा है ,
जिसे सोचता हूँ मैं हर घड़ी,
वो ख्वाब एक पुराना सा है ।।
यूँ तो दो जिस्म है अलग अलग हमारे ,
पर मेरे जिस्म में रूह सी शामिल हो तुम ,
यूँ तो माना के दूर हो मुझसे ,
पर हर एक लम्हे में मुझे हासिल हो तुम ,
सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??
गर एक ख्वाब हूँ तो मेरी आरजू हो तुम ,
गर हकीकत हूँ तो मेरा अस्तित्व हो तुम ,
एक पल भी जीना ग़वारा नही बिन तेरे ,
मेरे जिस्म में आती जाती साँसे हो तुम ,
सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??
मैं साज़ हूँ तो मेरी आवाज़ हो तुम ,
मैं गीत हूँ तो मेरा राग हो तुम ,
बहुत अधूरा सा हूँ मैं बिन तेरे ,
मेरे जीने का अंदाज़ हो तुम ,
सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??
तुझ बिन जीना तो सज़ा सा लगता है ,
मुझे तो तू मेरा खुदा सा लगता है ,
जी करता है तेरे सज़दे में मर जाऊँ,
बेगाना अब तो ये जहाँ सा लगता है ,
मैं राही मेरा मुकाम हो तुम ,
मेरे इश्क़ का अंजाम हो तुम ,
मेरे दिन रात सब तुझसे है ,
मेरी कभी न ढलने वाली शाम को तुम ,
सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??
मैं मूर्त मेरे कारसाज़ हो तुम,
मैं अनकही बात मेरे अल्फ़ाज़ हो तुम ,
बस इतना समझ आता है "चौहान" को तो
मैं अंत मेरा आगाज़ हो तुम ...
सवाल एक करता हूँ रोज़ मैं खुद से ,
के मेरे आखिर क्या हो तुम ??
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ