Friday, 29 June 2018

"सावन की बारिश" (SAWAN KI BARISH)


अच्छी नही लगती अब वो बूंदे सावन की ,
जिनमें अक्सर हम नहाया करते थे।।

अब वो पानी भी कींचड़ सा लगता है ,
जहां कस्ती कागज़ की चलाया करते थे।।

अब ज़िम्मेदारी है उन स्कूली बस्तों की जगह,
खुद भीग कर उन्हें भीगने से बचाया करते थे।।

इस बेमौसम बारिश में अब वो मज़ा कहाँ,
जो लुफ्त सावन की बारिश में उठाया करते थे।।

अब तो फिक्र सताती है काम पर जाने की उन्हें,
जो कभी बारिश में बेखौफ भीग जाया करते थे।।

अब नही निकलते बाहर खिड़की से हाथ "चौहान",
जो बारिश छूने की चाहत में भीग जाया करते थे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Tuesday, 26 June 2018

"मेरी कहानी" (MERI KAHANI)


मुझसे मेरी कहनी पूछते है लोग,
अल्फ़ाज़ों से नही ,मुँह-ज़ुबानी पूछते है लोग।।

कुछ कहते है कला, कुछ कहते है राज़ है,
जो दिल से हुई थी कभी वो नादानी पूछते है लोग।।

मेरे जज़्बातों में खुद को जीते है, घूँट सब्र का पीते है ,
जो कभी हो ही नही पाई वो मुलाकात रूहानी पूछते है लोग ।।

कुछ ज़ख़्मो का मरहम कहते है , कुछ यादों का संगम कहते है,
मुझसे मेरी  इन खामोशियों की कारिस्तानी पूछते है लोग।।

कुछ कहते है दर्द का सैलाब है , कुछ कहते है कल का आफ़ताब है ,
मिटा डाला खुद को जिसके लिए "चौहान" वो चेहरा नूरानी पूछते है लोग ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 21 June 2018

"मैं ना रहूँ" (MAIN NA RAHUN)



'गर मैं ना रहूँ तो तुम  निराश मत होना ,
भर के पानी आंखों में यूँ  उदास मत होना।।

कोई ख़्वाब समझ के भुला देना मुझे तुम ,
पर हकीकत की चाह में फिर देर तक मत सोना ।।

कर लेना गिले-शिकवे चाहे ताह उम्र तुम मुझसे,
पर अपने जज़्बातों को कभी खामोशी में मत पिरोना।।

घुल जाना किसी सागर में तुम दरिया की तरहा,
पर सुखी नदी की  तरह सूख के पत्थर मत होना ।।

युहीं तोड़ के रखना नाता चाहे तुम मुझसे अपना ,
पर मुझे याद करके कभी अपने अतीत पर मत रोना।।

पढ़ लेना "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" जो कभी मन हो मुलाकात का ,
कब्र पर आकर "चौहान" की तुम खुद पर फिर यूँ काबू मत खोना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।






Monday, 18 June 2018

"गुनहगार कौन??" (GUNEHGAAR KAUN??)


ख़ामोश इसलिए नही हूँ की मुझे कुछ छुपाना है,
जो देखकर भी अंधे है उनको कुछ दिखाना है ।।

जो बात करते है लिबाज़ों से इज्ज़त - संस्कार की,
इतना तो बताओ तुम्हारी हवस का कहना तक ठिकाना है।।

अपनी बहन बेटीयों के लिए तो नर्क नज़र आता है मंज़र बाहर का,
बाहर नज़रें ख़ुद ऐसी रखते है के हर ज़िस्म को नोंच-नोंच कर खाना है ।।

बेख़ौफ़ करते है गुनाह धर्म ,जात-पात ,को आड़े लेकर,
दो दिन आवाज़ उठा ख़ामोश हो जायेगें, जानते है किस्सा बहुत पुराना है।।

सज़दे करते है जहां सिर झुकते है कुछ उम्मीद लेकर,
सुना है आज कल तो वहां भी गुनाहों का ठिकाना है ।।

क्या सोचते हो जला के मोमबत्ती ,दे के धरना यहां तुम,
जिनसे उम्मीदें है उनका काम ही तो उठती आवाज़ दबना है ।।

बेख़बर है बिल्ली के सामने बैठे कबूतर की तरह सब,
नही जानते "चौहान" इस आग में राख एक दिन इन्हें भी हो जाना है ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।





Wednesday, 13 June 2018

"भ्रूण हत्या - एक अभिशाप" (BHRUN HATYA- EK ABHISHAP)


माँ क्या कसूर है मेरा ,
मैं भी तो आना चाहती हूँ इस जहाँ में,
क्या हक नही है मेरा??
माँ मैं एक लड़की हूँ ,
क्या बस यही कसूर है मेरा??
भगवान की बनाई इस दुनियां में,
क्यों नही है फिर मेरा बसेरा??
तू तो कहती थी कि सब एक जैसे है यहाँ,
फिर बेटा-बेटी में क्यों ही फर्क ये तेरा??
क्या मैं एक बेटी हूँ ,
क्या बस यही कसूर है मेरा??

वैसे तो सब कहते है माँ,
बेटी लक्ष्मी का स्वरूप है।।
अपनाना ना चाहे कोई भी,
फिर क्या ये सब झूठ है ??
फिर क्यों नही चाहता कोई ,
के खेले लक्ष्मी उसके घर आंगन में ,
बेटी से क्यों नही भरना चाहता,
खुशियां अपने दामन में,
माँ ये बेबसी तुझे क्यों नज़र ना आती है,
तू भी तो किसी की बेटी है,
तू ये फिर क्यों भूल जाती है??
जिसने जन्म दिया ,जो जन्म देती है ,
जननी वो कहलाती है ,
वो भी तो एक बेटी है ,
दुनिया क्यों ये भूल जाती है ??
जन्म से पहले ही फिर ,
क्यों बेटी मारी जाती है ??
मेरी रगो में भी तो बहता माँ खून है तेरा ,
क्या मैं एक बेटी हूँ ,
क्या बस यही कसूर है मेरा??

कदम तो रखने दे इस दुनियां में ,
तेरे सिर का ताज बन जाऊंगी,
कोई शिकायत ना दूँगी कभी,
जो कहेगी वो कर मैं कर जाऊंगी,
इस जहाँ में पहचान अपनी अलग बनाउंगी,
कलंक ना समझ मुझे अपने माथे का ,
सिर का ताज़ हूँ मैं तेरा ।।
क्या मैं एक बेटी हूँ ,
क्या बस यही कसूर है मेरा??

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Saturday, 9 June 2018

"इश्क़" (ISHQ)


हिसाब अलग है मुहोब्बत का मेरे दोस्त,
कुछ पाना ही नही कुछ खोना भी इश्क़ है ।।

कहाँ लिखा है के नसीब होंगी बस खुशियां,
सिर्फ हँसना ही नही रोना भी इश्क़ है ।।

ज़रूरी तो नही के हासिल हो मुकाम सबको,
मंज़िल की तलाश में चलते रहना भी इश्क़ है।।

सिर्फ जीना ही तो यहाँ ज़िन्दगी नही होती ,
किसी के ख़ातिर मर जाना भी तो इश्क़ है।।

ज़रूरी नही के हर बात यहाँ बोल कर बताई जाए,
कभी कभी आँखों से कह जाना भी इश्क़ है ।।

मिलना ना मिलना तो बात बाद कि है "चौहान",
किसी की इबादत में सज़दे करते रहना भी इश्क़ है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 7 June 2018

"दिल की गली" (DIL KI GALI)


कभी गली से मेरे दिल की गुज़र कर देखना ,
महक तेरे गेसुओं की सज़ों के रखी है हमने।।

वो दीवार जो कभी खाली खाली सी होती थी ,
आज तस्वीरों से तेरी अब सजा रखी है हमने ।।

हालत बंज़र है इस दिल-ए-मकां की माना पर,
तेरे इंतज़ार में चोंखट दीपों से सजा रखी है हमने।।

क्या फर्क पड़ता है कि क्या हासिल होगा क्या नही ,
मंज़िल तो आ देख अपनी मौत बना रखी है हमने।।

सब पूछते है मुझसे की क्यों है ये तन्हाई ये रुसवाई,
कैसे कहूँ अपने हाथों अपने अरमानों की चिता जला रखी है हमने ।।

परखनी है मुहोब्बत मेरी तो बेबाक आके परखे  वो,
उनके दिए ज़ख़्मो की चादर सीने से लगा रखी है हमने ।।

खुदा भी साथ कैसे देता इस हिमाकत पर मेरी "चौहान",
एक आम-सी  हस्ती अपना खुदा बना रखी है हमने।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।






Tuesday, 5 June 2018

"ख़्वाईश" (KHWAISH)


मुझे सागर की नही , दरिया की नही ,
बस एक कतरे की प्यास है ।।

नही चाहता के गुज़रे ज़िंदगी सालों भर ,
तेरे संग जो पल गुज़रे मुझे उसकी आस है ।।

कैसे भुला तुझे किसी और का हो जाऊं मैं ,
एक तरफा ही सही मुझे मेरे प्यार पर विश्वास है।।

ख़्वाईश नही मेरी कोई आरज़ू नही तुझसे बढ़कर,
एक नज़र भर देख लूं तुझे बस इतनी सी प्यास है।।

मुझसे प्यार नही नफ़रत सही कुछ तो कर,
में भी बोल सकूँ के तेरे मेरे लिए भी कुछ एहसास है।।

एक दिन तो नाम करदे मेरे भी तेरी ज़िंदगी का,
मैं भी बोल सकूँ के एक दिन है जो मेरी ज़िंदगी से भी खास है ।।

माना के क़ाबिल आज भी नही मैं प्यार के तेरे,
पर कुछ तो है जो तू मेरे लिए यहां सबसे ख़ास है ।।

ना जाने कितने अरमान दफ़न है सदियों से यहां "चौहान"
बंद क़िताबों में ना जाने कितनी मुहोब्बतों की लाश है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 2 June 2018

"फिर-मुहोब्बत" (PHIR MUHOBBAT)


तरसना है फिर से ,तड़पना भी है ,
जीना भी है तो फिर से मरना भी है ,
तोड़ना है खुशियों से नाता अपना,
दोस्ती अब फिर उदासियों से करनी है ,
हाँ मुझे फिर मुहोब्बत करनी है ।।

फिर से बहाना है वो आंखों का समुन्द,
फिर से डूबना है खुद को गम के अंदर,
तोड़ना है नींदों से नाता अपना ,
आज फिर से ये रातें काली करनी है ,
हाँ , फिर मुहोब्बत करनी है ।।

फिर किसी को मंज़िल बना मुसाफ़िर बनना है,
फिर किसी को खुदा बना कर काफ़िर बनना है,
बना कर नासूर पुराने घाव अपने ,
फिर नए ज़ख़्मो की चाहत करनी है ,
हाँ , फिर मुहोब्बत करनी है ।।

फिर ये गालियाँ दिल की वीरान करनी है ,
फिर ये ज़मी दिल की शमशान करनी है,
फिर  जोड़ना है नाता तन्हाई से अपना ,
फिर "मेरी कलम" से "दिल की ज़ुबाँ" लिखनी है,
हाँ , फिर मुहोब्बत करनी है ।।

तेरी खुशी के लिए मौत की चादर ओढ़ जाऊंगा मैं,
तू माने ना माने रिश्ता मरकर भी निभाउंगा मैं,
निकाल कर जिस्म से ये रूह अपनी "चौहान" ,
फिर तुझे रूह बना जीने की हसरत करनी है ,
हाँ ,मुझे फिर मुहोब्बत करनी है ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...