Friday, 27 April 2018

"तलाश" (TALASH)


कुछ जज़्बात मेरे गुमशुदा है,
कुछ ख़्यालात मेरे गुमशुदा है ,
यूँ तो रह-गुज़र है रातों में नींदों की ,
सच कहूं तो कुछ ख़्वाब मेरे गुमशुदा है ।।

कुछ पाने की हसरत भी है,
कुछ खोने की हिम्मत भी है ,
जाग कर गुज़ार भी दूँ इंतज़ार में रातें ,
पर मेरी वो तारों भरी रात गुमशुदा है ।।

सजदों में सिर भी झुकता है ,
मांगने को हाथ भी उठता है ,
ख़्वाईश मेरी बस एक तुम हो खुदा से ,
तेरे नाम की मेरे हाथों से लकीर गुमशुदा है ।।

रात की तन्हाईयां भी है ,
ज़िन्दगी से रुसवाईयाँ भी है ,
चाहता तो बता देता "चौहान" हाल-ए-दिल,
क्या कहूँ किताब-ए-दिल से वो अल्फ़ाज़ गुमशुदा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 26 April 2018

"मेरा प्यार" (MERA PYAR)


मेरा प्यार नही है तेरे वादों जैसा,
पल भर में बदले उन इरादों जैसा।।

गुस्ताख़ दिल है ये मानता नही,
तेरे सिवा किसी को जानता नही,
फीके पड़ जाए जो नही उन रंगों जैसा,
मेरा प्यार नही है तेरे वादों जैसा।।

रास्ते इश्क़ के युहीं नही मुश्किल बताते,
पागल नही वो जो उम्र भर इनपर चलते जाते,
छूट जाते है हाथ , अगर साथ हो तेरे जैसा,
मेरा प्यार नही है तेरे वादों जैसा।।

मरकर भी निभाउंगा उन वादों को ,
कैसे भुला दूँ दिल से तेरी यादों को,
ऐसे ही नही लिखता "चौहान" पैग़ाम वफ़ा का ,
मेरा प्यार नही है तेरे वादों जैसा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 25 April 2018

"तेरी-मेरी कहानी" (TERI - MERI KAHANI)


फिर वही दौर होने वाला है ,
खामोशियों का शोर होने वाला है ,
एक अरसे पहले जो आलम था ,
फिर उन्ही हालातों का जोर होने वाला है ,
शोरोगुल में भी तन्हाईयां होंगी ,
ज़िन्दगी से भी रुसवाईयाँ होंगी ,
दिल में कोई ना अरमान होगा ,
ख़्वाबों का आंगन वीरान होगा ,
राह तकती ये नज़र होंगी ,
नींदों से फिर बेख़बर होंगी,
दिन फिर यूँ वीरान होंगे ,
यादों के उठते तूफ़ान होंगे ,
कोई कहाँ रह पाएगा इस दिल मे ,
इस बस्ती के जब बंज़र मकान होंगे ,
इस दुनिया की भीड़ में खो जब हम जाएंगे,
तड़पोगे बहुत पर नज़र ना हम आएंगे,
दिल की सहरा में उठते जब तूफान होंगे,
जब वो मुहोबत के ताज शमशान होंगे,
हर सज़दे में जब मंगोंगे खुदा से हमें,
ऐसा फिर वो अंजाम-ए-मुहोब्बत होने वाला है,
इश्क़ की मदहोशी में मदहोश फिर "चौहान",
कहाँ तुझे उम्र भर तेरा होश होने वाला है ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 22 April 2018

"आज भी " (AAJ BHI )


तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ,
मैं आज भी तेरी यादों को लेकर जीता हूँ।।

हर रात तारों को गिना करता हूँ,
चाँद में तेरे चेहरे को ढूंढता हूँ,
हर रात गम के घूंट पीता हूँ,
तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ।।

दिन भर दिल की बेचैनी बढ़ती है ,
ज़िन्दगी तेरे आने की उम्मीद में कटती है,
सदियों से में बस तेरी राह तकता हूँ,
तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ,
तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ।।

कभी ना कभी तो दीदार तेरा होगा ,
कभी ना कभी दिल को करार होगा,
ना जाने कैसे ज़ख्म ज़िंदगी के सीता हूँ।।

मेरे अल्फ़ाज़ गवाह है मेरे प्यार के,
"चौहान" की बेचैनी ओर करार के ,
तुझे अपने जिस्म में रूह की तरह रखता हूँ,
तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ,

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 21 April 2018

"लौट के आ जाते -2" (LAUT KE AA JATE -2)


इक ख़्वाब देखा था हमने तुम्हे लेकर ,
तेरे ग़मों के बदले अपनी खुशियाँ तुम्हे देकर।।
काँटों से ही सही ,तुम मेरा आंगन तो सजा जाते,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।

गुनाहों सी हो गयी है अब तो ये जिंदगी ,
सज़ा सी लगती है मुझे अब तेरी बंदगी,
माना के टूट के बिख़र चुका था एहसास तो करा जाते,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।

दिन तो गुज़र जाता है ये तन्हा रात खा जाती है ,
कोशिश करता हूँ जो भूलने की तेरी याद आ जाती है ,
जाना ही था जो तुम्हे दूर कोई बहाना ही दे जाते ,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।

महफ़िलों में यूं तन्हाइयों का आलम ना होता ,
दिल मे पतझड़ , आंखों में बारिशों का मौसम ना होता,
क्या होता जो मेरा अंजाम भी अपने हाथों से लिख जाते,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।

नफ़रत तुमसे नही मुहोबत से हो गयी है ,
मौत ख़्वाईश नही ज़रूरत सी हो गयी है ,
अपने इस दीवान-ए-मुहोब्बत को जीना तो सीखा जाते,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।

ज़मता लहू शायद मेरा फिर से खौल जाता ,
बेज़ुबाँ लबों से "चौहान" कुछ तो बोल पाता ,
मेरी कब्र पर मिलने आज तो बेहिज़ाब आ जाते ,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 20 April 2018

"इश्क़" (ISHQ)


गमो में तेरा मुझे हँसना है इश्क़,
मेरे दर्द पर तेरा अश्क़ बहाना है इश्क़,
लबों पर आकर रुक जाती है जो ,
उन बातों को आंखों से कह जाना है इश्क़,
बिन बोले हाल-ए-दिल बताना है इश्क़,
एक झलक पाके मुस्कुराना है इश्क़,
किताबों में बंद कोई फ़साना है इश्क़,
कोई आने वाला मुहोब्बत-ए-ज़माना है इश्क़,
मेरे लबों से निकला तराना है इश्क़,
तेरा मुझमे समाना है इश्क़,
लोग लिखते रहे किस्से मुहोब्बत के ना जाने कितने ,
तेरा "चौहान" की ज़िंदगी मे आना है इश्क़ ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 17 April 2018

"लौट के आ जाते" (LAUT KE AA JATE)


ज़मी दिल की ना बंज़र होती ,
हर एक साँस ना खंज़र होती,
ये आंखें ना वीरान होती ,
ये रूह ना शमशान होती ,
'गर तुम लौट के आ जाते ।।

ज़ख़्म दिल के ना मेरे नासूर होते,
नज़रे चुराते ना 'गर तुम बेकसूर होते ,
रातों को यूं हमे खाती तन्हाई ना होती ,
तेरे दिल मे 'गर ये रुसवाई ना होती ,
गर तुम लौट के आ जाते ।।

ना ये किस्सा बाज़ार -ए-इश्क़ में शरआम होता,
ना मेरी नज़्मों में तेरा यूँ बेवफा नाम होता ,
यूँ ना मिटाता  खुद अपनी हस्ती "चौहान"
मिल जाते हमे भी इश्क़-ए-सफ़र में मुकाम,
गर तुम लौट के आ जाते ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 16 April 2018

"मलाल" (MALAAL)


उसे अपनी ज़िद्द की फिक्र थी,
मुझे अपने प्यार का ख़्याल था।।

ना मिल सके हम फिर कभी,
वो हमारी मुहोब्बत का सवाल था।।

मेरे लिए वो ही मेरा सबकुछ था ,
उसके लिए सबकुछ एक मजाक था।।

उसे फिक्र अपनी मंज़िलों की थी ,
यहां मेरी ज़िंदगी का सवाल था।।

हम इंतज़ार में मर गए "चौहान",
जान के बेख़बर थे वो मुझे इसका मलाल था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Saturday, 14 April 2018

"फिर लौट के ना आया" (PHIR LAUT KE NA AAYA)


ऐसा क्या हुआ की फिर कभी वो लौट के ना आया ,
चेहरा दिखाना दूर साया तक भी नज़र ना आया ।।

दिल में तो उसके भी कुछ अरमान थे ,मंज़िल थी मुकाम थे ,
हमसफ़र बनना तो दूर वो तो राहगीर बन रास्तों में भी नज़र ना आया ।।

मिन्नतें भी बहुत की थी हमने सज़दे भी बहुत किये थे लेकिन,
ऐसा क्या हुआ की खुद को खुद में नमाज़ में बैठा कोई काफ़िर नज़र आया ।।

सुकून भी मिला था और ज़ख्मों पर मरहम सा लगा था छूना उसका ,
फिर ऐसा क्या हुआ की उसका दिया हर ज़ख़्म हमें नासूर नज़र आया ।।

लिखे तो बहुत थे फ़साने मेरे बाद भी उन्होंने मुहोब्बत के "चौहान",
ऐसा क्या हुआ फिर कभी पैग़ाम-ए-मुहोब्बत में मेरा नाम  नज़र ना आया ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Monday, 9 April 2018

"मेरा ना रहा" (MERA NA RAHA)


सूरज निकला तो वो रात का अँधेरा ना रहा,
आँखें जब खुली तो कोई ख्वाब मेरा ना रहा।।

देखा था जब तुझे पहली बार इन आँखों ने,
फिर कभी इनमे नींद का फेरा ना रहा।।

तूने किया जब रुख़्सत मेरे मकां-ए-दिल से,
तब से यहाँ फिर और किसी का बसेरा ना रहा।।

लिखता रहा "चौहान" यूँ जाग कर हाल-ए-दिल,
तेरी रग-रग में बहता इश्क़ कभी मेरा ना रहा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 7 April 2018

"वो ग़ैर थे" (WO GAIR THE)


वो ग़ैर थे जो अपनेपन का एहसास दिलाते थे ,
वो ग़ैर थे जो हर पल साथ साये से नज़र आते थे ।।

मुहोबत भी झूठी थी , फ़साने भी झूठेे थे ,
एक फ़रेब थे वो जो सच सा नज़र आते थे।।

मंज़िल भी अलग थी हमारी रस्ते भी अलग थे,
रस्ते अनजान थे मेरे जो बस तुम तक आते थे।।

रातें भी तन्हा थी मेरे तो  दिन भी वीरान  थे ,
वो दर्द-ए-दिल थे जो दिल का चैन नज़र आते थे।।

पास भी रहना था उनके और गम भी ना सहना था,
वो एक घुटन थी जो खुला आसमान नज़र आते थे।।

क्या लिखना था और क्या बताना था "चौहान",
वो ख़ामोशी थी मेरी जो अलफ़ाज़ से नज़र आते थे ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 6 April 2018

"कभी तो आओगे तुम" (KABHI TO AAOGE TUM)


ये जो गलियाँ आज सुनी नज़र आती है ,
ये जो राहें ना जाने कहाँ पर ले जाती है ,
कहीं दूर तक मेरी नज़र बस तुझे ढूँढती जाती है ,
दिल से बस एक आवाज़ आती है ,
की कभी तो आओगे तुम,
लौट के इन गलियोँ में ,
कभी तो आओगे तुम।।

कैसे कहूँ और कैसे कहूँ,
जो दिल के जज़्बात है ,
आ देख एक दफ़ा आ के ,
तेरे बिन जो मेरे हालात है ,
तेरी यादें दिल में दर्द दे जाती है ,
कहीं दूर तक मेरी नज़र बस तुझे ढूँढती जाती है ,
दिल से बस एक आवाज़ आती है ,
की कभी तो आओगे तुम,
लौट के इन गलियोँ में ,
कभी तो आओगे तुम।।

तुझसे नाता मुझसे ऐसा ,
ये नाता कभी टुटा ही नही ,
तू इस कदर मिला मुझसे ,
तेरा मोह मुझसे छूटा ही नही ,
"चौहान" तेरी ख़ामोशी मुझको,
तेरे दिल का हाल सुनाती है ,
कहीं दूर तक मेरी नज़र बस तुझे ढूँढती जाती है ,
दिल से बस एक आवाज़ आती है ,
की कभी तो आओगे तुम,
लौट के इन गलियोँ में ,
कभी तो आओगे तुम।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 5 April 2018

"किस्से चाहत के " (KISSE CHAHAT KE)


ये किस्से तेरी चाहत के ,कभी तो आम होंगे ,
रंग तेरी बेवफाई के ,कभी तो शरेआम होंगे।।

कया हुआ जो आज तक सफ़र में है ज़िन्दगी,
कभी तो हासिल हमें भी मुकाम होंगे ।।

माना एक नशा सा था तेरे इश्क़ का मुझपर,
क्या हुआ तू नही इस शहर में महख़ाने तमाम होंगे ।।

कब तक जीतते रहेंगे वो यूँ दगा कर कर के ,
कभी तो हमारे हाथों में भी जीत के जाम होंगे ।।

हश्र के वक़्त कौन देगा गवाही उनकी ,
रब की अदालत में जब साबित -ए-इलज़ाम होंगे।।

कब तक  यूँ छुपकर बेवफाई के बाजार चलाते रहोगे,
कभी ना कभी तो ये सब रुबरु-इ-आवाम होंगे।।

क्या हुआ "चौहान" आज इस भीड़ में गुमनाम है तो,
कभी तो इस नाम को चाहने वाले तमाम होंगे ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Wednesday, 4 April 2018

"मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" (MERI KALAM - DIL KI ZUBAA'N)


जब मिलेंगे तुमसे तो ढेर सारी बातें करेंगे हम,
जी भर के तुझे देखेंगे तुझे आँखो में भर लेंगे हम।।

फिर से बैठेंगे रात भर तारों की छावं में ,
चाँद की चाँदनी में रात भर तुझको देखेंगे हम।।

सोओगे जब तुम मेरी बाँहों में आकर ,
तेरी नींद की हिफाज़त में रात भर जागेंगे हम।।

चलते थे जिन रास्तों पर कदम कदम संग मेरे,
उन्ही रास्तों पर तेरे हाथों को थाम के चलेंगे हम।।

पढ़ा करती थी जिनको पास बैठ के "चौहान" के तुम,
फिर वही "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" लिखेंगे हम।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Sunday, 1 April 2018

"आखिरी पैग़ाम" (AAKHIRI PAIGAAM)


बेवज़ह नही ,
ये मिलना हमारा,
पास आना तुम्हारा,
बेवज़ह नही।।

दिन भर का इंतज़ार ,
तेरे लिए झूठा सही ,
मेरा वो बरसों का प्यार ,
बेवज़ह नही।।

यूँ रात-रात भर जगना,
हर दुआ में तुझे मांगना ,
बेवज़ह नही।।

ये आँखों की नमी,
ज़िन्दगी में बस तेरी कमी ,
बेवज़ह नही।।

तेरे दर्द-ओ-गम को अपना बनाना,
तुझमे खुद को जीते जाना ,
बेवज़ह नही।।

तुझे रब बना तेरी पूजा करना ,
तेरे बिना हर-पल पल-पल मरना ,
बेवज़ह नही।।

होंठो से तेरा अलफ़ाज़ बन निकलना ,
कलम से तेरा जज़्बात बन निकलना,
बेवज़ह नही।।

पढ़े होंगे बहुत मुक्कमल फ़साने महोब्बत के ,
अधूरा होके भी पूरा मेरी मुहोब्बत का किस्सा ,
बेवज़ह नही।।

आखिरी पैगाम है "चौहान" का तेरे नाम ,
तेरी हसरत में  खुद को मिटा जाना ,
बेवज़ह नही।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...