कुछ जज़्बात मेरे गुमशुदा है,
कुछ ख़्यालात मेरे गुमशुदा है ,
यूँ तो रह-गुज़र है रातों में नींदों की ,
सच कहूं तो कुछ ख़्वाब मेरे गुमशुदा है ।।
कुछ पाने की हसरत भी है,
कुछ खोने की हिम्मत भी है ,
जाग कर गुज़ार भी दूँ इंतज़ार में रातें ,
पर मेरी वो तारों भरी रात गुमशुदा है ।।
सजदों में सिर भी झुकता है ,
मांगने को हाथ भी उठता है ,
ख़्वाईश मेरी बस एक तुम हो खुदा से ,
तेरे नाम की मेरे हाथों से लकीर गुमशुदा है ।।
रात की तन्हाईयां भी है ,
ज़िन्दगी से रुसवाईयाँ भी है ,
चाहता तो बता देता "चौहान" हाल-ए-दिल,
क्या कहूँ किताब-ए-दिल से वो अल्फ़ाज़ गुमशुदा है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।














