ये जो रात है ,इस रात में ,कोई बात है , इस रात में ,
मेरे ज़हन में ,जज़्बात में , कोई साथ है, इस रात में।।
बादलों में छुपकर देख रहा है चाँद आज ज़मी पर,
ये कैसा नूर दिख रहा है आज धरती पर इस रात में।।
आँखो में कई सवाल है पर लबों पर खामोशी है आज,
कोई सिमट गया है मेरी बाहों में आकर इस रात में।।
बह गए है आज गम सारे यूँ आँखों से अश्क़ बनकर,
हक अत्ता हो रहा है नमाज़ का मेरी जैसे इस रात में।।
अब जान भी निकल जाए तो क्या परवाह "चौहान",
कोई जिस्म में समा गया मेरी रूह बनके इस रात में ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No comments:
Post a Comment