Tuesday, 18 December 2018

"पागल लड़की" (PAGAL LADKI)


सहमी होगी ,ख़ामोश भी,शायद कहने से डरती होगी,
वो पागल लड़की आज भी मुझसे मुहोब्बत बेइंतहा करती होती।।

आज भी उसके ख्यालों में बस मेरा बसेरा होगा,
आज भी शायद उसकी रातें मेरी यादों में गुज़रती होंगी।।

मन तो आज भी करता होगा उसका मुझसे लिपट रोने का,
आज भी शायद घूंट आँसुओं के पी पी कर खुद में ही मरती होगी।।

आज भी शायद उस परवरदिगार से मुझे माँगती होगी,
आज भी शायद एक झलक पाने को रात-रात भर जगती होगी।।

आज भी वो शायद मेरे खामोशी से एहसास को भाँपती होगी,
आज भी शायद वो अतीत को साथ ले आज से भागती होगी।।

आज भी मेरी मुहोब्बत का दिया अपने दिल मे जगाती होगी,
लाश बना "चौहान" खुद को वो नज़र दुनिया को जिंदा आती होगी।।

आज भी शायद उसे इंतज़ार होगा मेरी कविताओं का,
आज भी वो छुपके से "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" पढ़ती होगी।।



शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


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