कसमे खाई थी जिन रास्तों पर चलने की साथ मेरे,
मंज़िल से पहले फिर क्यों हमसफ़र वो जुदा हो गए।।
कभी पल भर में बरस जाती थी आंखें जो दूरी में,
आज कैसे वो आँखों के साग़र सुख के सहरा हो गए ।।
दिल क्या जान तक रख दी जिसके कदमो में हमनें,
आज कैसे मान लूं की वो हमसे बेवफा हो गए ।।
जो कभी झुकाते थे सर हर दर चोंखट पर तेरी खातिर,
सुना है आज कल वो शक़्स तो खुद से खफ़ा हो गए।।
तूने इश्क़ में जिसे चाहा जिसकी इबादत की हर पहर,
देख ले "चौहान" वो पत्थर तो सच मे खुदा हो गए।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wah!
ReplyDelete