अलग है तो फिर कैसे है तू बता मुझे,
खुदा और मुहोब्बत बात तो एक ही है।।
सागर नदी में मिले या नदी सागर में ,
मिलकर होना तो दोनों को एक ही है ।।
ज़िक्र तेरा मेरी बातों में हो या किताबों में,
फ़साना मुहोब्बत का तो एक ही है ।।
ख़्वाब टूटे मेरे या टुट के बिखरे दिल मेरा,
अलग क्या है हालात तो दोनों में एक ही है।।
कलमा पढूं, गीता पढूं , या आयात पढूं कुरान की,
बात मज़हब की है इबादत तो एक ही है ।।
जल के राख हो जाऊं या दफ़न हो जाऊं मिट्टी में,
इश्क़ में मिटना है "चौहान" बात तो एक ही है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम-दिल की ज़ुबाँ

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