मेरे बाद खुद ही में ढूंढोगी मुझे,
तेरे जिस्म में रूह बन जाऊंगा मैं।।
कहीं नजर ना आऊँगा तुम्हे मैं,
कुछ इस कदर गुम हो जाऊंगा मैं।।
आँखो से अश्क़ बनकर आऊंगा मैं,
तेरी आँखों से हि बह जाऊँगा मैं।।
दिल मे जज़्बात बनकर आऊंगा मैं,
होठों से बात बनकर निकल जाऊँगा मैं।।
हर रात ख़्वाब बनकर आऊंगा मैं,
सुबह नींद के साथ निकल जाऊँगा मैं।।
गम की धूप में साये सा साथ पाऊंगा मैं,
सुख की छांव में दूर निकल जाऊंगा मैं।।
हर किसी में नज़र फिर आऊँगा मैं,
छू कर तुझे हवा सा निकल जाऊँगा मैं।।
कैसे रखोगी "चौहान" को हाथों से रोक कर,
रेत बनकर तेरे हाथों से फिसल जाऊंगा मैं।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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