Thursday, 13 December 2018

"शायद तुम नही जानती" (SHAYAD TUM NHI JAANTI)


शायद तुम नही जानती,
कोशिश तो कई दफा की ,
की बता दूँ तुम्हे,बता दूँ की,
ये दिल खफ़ा -खफ़ा सा क्यों है,
गर पहले जैसा ही है सब आज भी,
तो फिर ये दिल जुदा-जुदा सा क्यों है,
क्यों अब तेरे दीदार में करार आता है,
क्यों तेरी हर एक बात पर प्यार आता है,
क्यों फिर दिल दूरी सह ना पाता है,
दूर जाने की सोच कर भी क्यों घबराता है,
शायद तुम नही जानती,
तुम नही जानती के अब ,
तेरी उदासियां से उदास होता है,
हर वक़्त बस तेरे ही पास होता है,
तेरी आँखों मे आँसू सह ना पायेगा,
जानता हूँ तुझसे कभी कह ना पायेगा,
कुछ ख़त लिखे थे तुझे ,
लिखे ही रह गए ,
बारिश में उनके संग मेरे ,
जज़्बात भी बह गए,
दोस्ती कभी की नही तुझसे ,
पर दोस्त से बढ़ कर ही माना है तुझसे,
तुझ बिन अब जीना कैसा,
जिस्म में रूह सा जाना है तुझे,
शायद तुम नही जानती,
रोज़ रात आईने के सामने,
बातें भी करता है बैठकर,
पर खामोशी आ जाती है लबों पर,
हकीकत में तुझे सामने देखकर,
यूँ तो बातें तेरी चाँद तारों को बताता है,
कहीं खो ना दूँ तुम्हे ,
ये सोचकर ही रुक जाता है,
ना जाने कहाँ कहाँ सज़दे किये तेरी ख़ातिर,
जहाँ सर झुके "चौहान" बस तुझे मांगता है,
शायद तुम नही जानती।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


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