Tuesday, 27 November 2018

"मेरा आज"(MERA AAJ)


तुझसे दूरियां मैं युहीं नही बढ़ा रहा हूँ,
इन हालातों में खुद को आजमा रहा हूँ।।

वो जो सोचते है मुझे फ़र्क नही पड़ता,
उनकी सोचों को हकीक़त बना रहा हूँ।।

मेरे पागलपन की हद देख हैरान है वो,
ज़ख्मों पर मलहम नमक का लगा रहा हूँ।।

इस कदर मिट्टी हुए सपने मेरे मुझमे,
खुद कब्र खोद खुद को दफना रहा हूँ।।

बस नाम के रह गए है रिशते कुछ ,
फिर भी ज़िम्मेदारी से निभा रहा हूँ।।

और वक़्त तो आज ये आ गया है "चौहान",
अपनी बर्बादी देख खुद मुस्कुरा रहा हूँ ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



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