पूछा था एक रोज़ उसने मुझे,की इश्क़ क्या है,
वक़्त भी दिया था सोचने का की ये इश्क़ क्या है।।
जवाब तो कई थे मेरे पास ,उस वक़्त भी तेरी बातों के,
सोचा वक़्त आएगा तो बताऊँगा हकीक़त में इश्क़ क्या है।।
तेरा-मेरा रिश्ता इश्क़ है तो सब झूठ-फरेब है बेकार है,
मेरा ना होकर भी मेरा होना हकीकत में ये इश्क़ है।।
चंद मीठी बातें कर दिल बहला देना इश्क़ है तो बेकार है,
तेरे हर हाल में खुद को जीना हकीकत में ये इश्क़ है।।
जिस्मो का मिल जाना,मिलने की चाहत रखने प्यार नही है,
ज़िस्म में रूह बन कर उतर जाने हकीक़त में ये इश्क़ है।।
किसी को दिखाकर या जताकर फिक्र करना इश्क़ नही है,
किसी के लिए नाता नींदो से टूट जाने हकीकत में ये इश्क़ है।।
जरूरी नही के नाम राधा-मोहन् सा जुड़े तो इश्क़ है,
किसी से मीरा सा दिल लगाना हकीक़त में ये इश्क़ है।।
किसी को पाने की चाहत करना भी इश्क़ नही है,
किसी के लिए खुद को खो देना हकीक़त में ये इश्क़ है।।
जो लिखा अभी तक मैंने तेरे लिए वो इश्क़ नही है,
जो मैं कभी लिख ही ना पाया हकीक़त में वो इश्क़ है।।
नही कहता "चौहान" के किसी को खुदा बनाना इश्क़ है,
उस खुदा की इबादत में मिट जाना हकीक़त में ये इश्क़ है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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