Friday, 9 November 2018

"ज़रूरत" (ZARURAT)


मेरे सपनों की हकीक़त बन बैठी,
मुहोब्बत अब ज़रूरत बन बैठी।।

यकीन ना रहा अब साँसों पर अपनी,
कुछ ऐसे वो मेरी रूहानियत बन बैठी।।

अंदाज़ में उसके जीने लगा हूँ खुद को,
जैसे वो मेरी अदब- लियाकत बन बैठी।।

बचा के रखने लगा हूँ दुनिया की नज़रों से,
मुहोब्बत आज जैसे तिज़ारत बन बैठी।।

बैर कर लिया अब तो ज़िन्दगी से हमने,
इस दिल-ए-नादां की हिमाकत बन बैठी।।

बड़े अदब से पेश आने लगा हूँ गमो से अपने,
ख़ामोशी ऐसे चढ़ी ज़ुबाँ की शराफ़त बन बैठी।।

लिहाज़ आँखो का था के बस कुछ बोली नही,
नींदे तो आँखों से की बाते बगावत बन बैठी।।

एक दिल का ही तो हेर-फेर हुआ था ,
जान से कीमती वो अमानत बन बैठी।।

राख शमशान की होकर भी खामोश था "चौहान",
वो जिस्म में कैद साँसों की ज़मानत बन बैठी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।







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