तन्हाइयों की आग में पल पल जलता रहा,
ज़ख़्म गहरे थे और मैं अंगारों पर चलता रहा।।
शायद कुछ मज़बूरी ही रही होगी दिल की,
तुझे रोशन करने को मैं मोम-सा पिंगलता रहा।।
देखते देखते शमशान बन गया मेरे दिल का शहर,
ख्वाइशें मेरी मरती रही और मैं दफ़न करता रहा।।
धागे कच्चे तो क्या, मोती कोहिनूर थे सपनो के मेरे
कहीं टूटे ना जाये इसलिए मैं टूट के बिखरता रहा।।
तेरी आरज़ू ने जीने की ख़्वाईश पैदा कर दी मुझमे,
और तेरे संग जीने की चाहत में हरपल मरता रहा।।
असलियत तो कभी लिख ही नही पाया "चौहान",
वहम था लोगो का की दर्द अपने मैं लिखता रहा।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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