कुछ राज़ दफ़न हो गए ,आंखों से अपनी बहने ना दिया,
वो फिर लौट के ना आया , दिल मे जिसने रहने ना दिया ।।
ख़्वाईश तो बहुत थी गम उनके चुरा कर खुशियाँ सारी देने की,
कमबख्त ऐसा था ज़ख़्म दिया और ज़ख़्म सहने भी ना दिया।।
इस जिस्म में मेरे रूह सा साँसों को हवाओं सा लाज़मी था वो ,
इस कदर मिले के जान भी ना ली और जीने भी ना दिया।।
माना के टूट के बिखर गई माला आज मेरे ख़्वाब-ए-मुहोब्बत की,
ऐसा मोती था वो माला का मेरी जिसे जुदा खुद से कभी होने ना दिया।।
बस एक अतीत बनकर ही रह गया वो बंद क़िताबों में "चौहान",
जो ना कभी तेरा हुआ ना तुझे किसी का कभी होने दिया।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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