काश के मेरे खुदा कोई अब चमत्कार हो जाये,
पल भर ही सही उनको भी हमसे प्यार हो जाये।।
क्या होती है बेकरारियाँ ,ये तड़प जाने वो भी,
उनका भी अब मेरे बिन जीना दुश्वार हो जाये।।
रहूँ रमज़ान में भूखा इबादत में खुदा के मैं,
जो पालूं एक झलक उसकी मेरा इफ़्तार हो जाये।।
बैठ कर करे बातें रात भर चाँद तारों से फिर वो,
आमना -सामना तन्हाइयों से एक बार हो जाये।।
पार कर ले आग का दरिया फिर हम दोनों,
माँझी बनूँ मैं और वो मेरी पतवार हो जाये।।
हीर रांझे ,लैला मजनू जैसी मुहोब्बत ना भी हो चाहे,
पर मेरे जिस्म मेरे रूह की वो हक़दार हो जाये।।
भले ही वो आये शब-ए-वस्ल पर मिलने हिज़ाब में ,
आंखें भी मिले ऐसे के रमज़ान में इफ़्तार हो जाये।।
समझ लिया मुहोब्बत को हमने जिस तरहा "चौहान",
काश वो भी थोड़ी-बहुत अब समझदार हो जाये।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम- दिल की ज़ुबाँ।।

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