तू भी कहाँ फिर रात भर सोई होगी,
याद करके हर पल को तू भी तो रोई होगी।।
कहाँ छुपा कर रखें तूने टूटे हुए ख़्वाब,
राख अरमानों की कहाँ पर संजोई होगी।।
मिटना चाहा होगा तुमने भी हाथों की लकीरों को,
खुशबू हाथों से हाथों की कहाँ अब तक खोई होगी।।
तड़पी होगी फिर रूह तेरी रूह से ज़ुदा होकर,
चादर फिर तूने अपने अश्क़ों से भिगोई होगी।।
फिर कहाँ करार आया होगा दुनिया के ऐशोआराम में,
जब चौहान" वो तेरी कब्र से लिपट कर सोई होगी।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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