Monday, 24 December 2018

"तेरा-मेरा इश्क़" (TERA MERA ISHQ)


तेरी यादों ने रात भर सोने ना दिया,
तेरे वादों नेें पल भर भी रोने ना दिया ।।

ना जाने क्या रिश्ता क्या एहसास है तुमसे,
हकीकत दूर, दूर ख्यालातों में भी होने ना दिया।।

कब तुम ज़िन्दगी और ज़िस्म में रूह बन गए,
तेरी चाहतों ने तन्हाइयों में खोने ना दिया ।।

सब मोती समेट कर रख लिए हमने इश्क़ के,
टूट जाने के डर से कभी माला में पिरोने ना दिया।।

हर दर्द हर ज़ख़्म को अपना बना लिया तूने,
क्यों कभी ये दर्द का एहसास मुझे होने ना दिया।।

जला रखा था तेरे इंतज़ार में जो मुहोब्बत का दिया,
हवाओं की गिरफ्त में हमनें कभी होने ना दिया।।

इश्क़ तेरा भी सच्चा था , इश्क़ मेरा भी सच्चा था,
मिल ना पाए पर कभी किसी और का होने ना दिया।।

चंदन तो ना बन सका कभी "चौहान" तेरी ख़ातिर,
मिट्टी की खुशबू था भीग कर भी अलग होने ना दिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





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