Friday, 14 September 2018

"बचपन और जवानी" (BACHPAN AUR JAWANI)


जवानी से मेरी आज वो लड़कपन रुठ गया ,
बड़ा क्या हुआ माँ का आँचल छूट गया ।।

दो आँसू बहने से हो जाती थी हर बात पूरी,
आज ज़ख़्मो पर भी अश्क़ बहाना छूट गया।।

कभी रुठ जाते थे तो मनाने आता था हर कोई,
आज लगता है कि मुझसे ये सारा जमाना रुठ गया।।

हर किसी के लिए खिलौने जैसा ही था मैं कभी,
आज बेखबर है वो के उनका ये खिलौना टूट गया ।।

उम्र का पड़ाव था बिन बात हँस लेता था "चौहान",
आज लगता है जवानी से हँसी का नाता ही टूट गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


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