Monday, 24 September 2018

"अंजाम"(ANZAAM)


अब तो इस कहानी का अंजाम लिख दे,
बहुत चल लिया अब आराम लिख दे।।

कई बरसों से दिन से रात है रात से दिन,
मेरे हिस्से में अभी अब कोई शाम लिख दे।।

बस दर्द ही देने है मुझे तो फिर आँसू ना देख,
नासूर कर दे या इन ज़ख़्मो में आराम लिख दे।।

जाने भी नही देता और जान भी नही लेता ,
प्यार ना सही जज़बातों में इंतकाम ही लिख दे।।

गर मिलाया है मुझसे तो मेरा बना भी दे उसे,
या इन लकीरों में अब मौत का ही नाम लिख दे।।

कब तलक लिखता रहूंगा यूँ फसाने मुहोब्बत के ,
अब तो कलम से तेरी मेरा कोई मुक़ाम लिख दे।।

कर दे रूह उसके नाम 'गर सच्ची है इबादत मेरी,
या हिस्से में "चौहान" के आज शमशान लिख दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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