यहाँ सब अपनी परेशनियों को लेकर परेशान है,
आओ तुम्हे दिखाऊँ क्या असली हिंदुस्तान है।।
यूँ तो देश मेरा बहुत तेज़ी से विकसित हो रहा है,
पर उनका क्या जो आज भी फुटपाथ पर सो रहा है।।
खुद की बोई की फसलों का मोल भी नही मिल पता ,
आज दूसरों को खिला खुद भूखा मर रहा किसान है।।
विज्ञान के युग मे इंसानियत भूल बैठा है हर कोई,
दौलत के गुरुर पर हर कोई बन बैठा भगवान है।।
दिखावे को तो अब हम दस्तूर बना कर बैठे है,
डरते है तभी सच की तसवीर छुपा कर बैठे है।।
कपड़ो है पैमाना आज भी इज्ज़त का यहाँ पर,
कहीं खुले में तो कहीं छुपकर बिक रहा ईमान है।।
सियासत ने कर दिया खोखला देश दीमक की तरहा,
अंदर झांक के देखो मेरा भारत कहाँ अब महान है।।
वक़्त आने पर तो बापु के बंदर बन जाते है लोग यहाँ,
तभी आजकल यहाँ पर इंसानियत कत्ल-ए-आम है।।
थोड़ी लगाम लगा कर रख अपनी कलम को "चौहान",
जो देश बेच खा गए हमें आज भी उनपर अभिमान है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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