आलम क्या बताऊँ ,मैं कुछ कर नही पाया।।
हाथों ही हाथों में रह गए,खत तेरे दिए वो सारे,
क्या बताऊँ,ना मैं पढ़ पाया, ना ही जला पाया।।
एक ज्वालामुखी सा फुट गया यादों का तेरी,
मेरी आँखों का समुंदर ,जिसे बुझा भी ना पाया।।
उसी दौर में लेकर जा रहे थे, जिससे निकला भी न था,
कत्ल तो पहले ही थे, बस कभी दफ़न कर ना पाया।।
क्या लिखुँ कैसे गुज़री है रातें ,तन्हाई में तेरी याद लेकर,
बहुत कोशिश की "चौहान", कभी लिख ही ना पाया।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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