मैं कुछ कुछ तुम्हारे जैसा हूँ,इस अँधेरो में सवेरे जैसा हूँ।।
जो एक अरसे से वीरान पड़ा है,
कई यादें समेटे उस बसेरे जैसा हूँ।।
हर रोज़ आईने से पूछता हूँ सवाल,
क्या हक़ीक़त में मैं मेरे जैसा हूँ।।
हर जवाब एक सवाल हो जैसे
मैं किसी दीये तले अंधेरे जैसा हूँ।।
जिसके टूटने की सब दुआ करे,
मैं उस आसमान के तारे जैसा हूँ।।
समझता हूँ लोगो का मौसमी अपनापन,
मैं उनके लिए एक सहारे जैसा हूँ।।
इतना करके भी क्या मिला "चौहान"
मैं जीत कर भी किसी हारे जैसा हूँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
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