Friday, 9 October 2020

"तुम कब तक" (TUM KAB TAK)


 

कब तक झूठ को सच मान कर जियोगे,
कब तक इस राह में भटकते रहोगे,
मैं तो कब का हो गया बेवफ़ा तुमसे,
तुम कब तक मुझसे प्यार करते रहोगे,
मैं तो मंज़िल पाकर भी राहों में हूँ,
तुम कब तक यूँ मेरे पीछे आओगे,
मैं तो खुद किसी और का हो गया,
तुम मुझे कब तक अपना बनाओगे,
ज़ुर्म मेरा था तो सज़ा भी मेरी है,
मेरी ग़लती को कब तक तुम अपना बताओगे,
मैं अकेला ठीक हूँ इस बेमौसम बरसात में,
तुम नाज़ुक हो झुलस जाओगे,
हर बार तो भरोसा तोड़ा है मैंने तुम्हारा,
तुम कब तक यूँ आँखे बंद कर भरोसा करोगे,
अभी भी वक़्त है लौट जाओ इस राह से,
इस राह पर मैं अकेला ही ठीक हूँ,
हर वक़्त हर राह पर मेरे साथ क्या करोगे,
अब वक़्त आ गया बर्बादी का मेरी,
क्यों मेरी ख़ातिर तुम खुद को बर्बाद करोगी,
एक नया सवेरा है सामने तेरे,
एक नई उम्मीद है,
इस राह से मुड़ जाना वापिस ,
क्यूँ मुझे तुम इस ज़िन्दगी से आज़ाद नही करोगी,
मेरा तुम्हारा साथ यही तक ही तो था,
अब ये साँसे ये कलम अब सब थम रहा है,
तुम कब तक "चौहान" से मुहोब्बत करोगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

2 comments:

  1. हर बार तो भरोसा तोड़ा है मैंने तुम्हारा,
    तुम कब तक यूँ आँखे बंद कर भरोसा करोगे, favourite line👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌

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