Tuesday, 22 December 2020

"मैं और तुम" (MAIN AUR TUM)

 


कभी आ तू मुझसे मिल सही,
कभी आ मैं तुझे खुद से मिलाऊँ।।

एक हकीकत से रूबरू है तू,
एक हक़ीक़त तुझे मैं बताऊँ।।

कब क्या करूँ के तुझे यकीन हो मुझपर,
कहाँ दस्तख़त कर तुझे यकीन दिलाऊँ।।

किस तरीके से समझाऊँ तुझे मैं,
किस बहाने से तुझसे मैं मिलने आऊँ।।

तेरा मेरा कोई रिश्ता भी ना रहा,
किस हक से तुझे मैं अपना बताऊँ।।

कोई मंज़िल हो तो बतला मुझे भी,
या मैं इन रास्तों का होकर मर जाऊँ।।

तू मेरे बगैर भी खुश है "चौहान",
मैं खुशियाँ किस दर से माँग कर लाऊँ।।

इस आईने पर दरारे बहुत है ,
इसमें तुझे चहरा कैसे दिखाऊँ।।

सुना है इस कि मंज़िल मौत है,
तुम कहो तो ये भी मैं कर जाऊँ।।

कब तक तेरी नज़्म पढ़ती रहूँगी,
कब तक खुद को खुद समझाऊँ।।

तू आ एक दफा कोई वजह तो दे,
यूँ कैसे मैं तुझसे बिछड़ जाऊँ।।

अब तो वो झगड़ा भी नही है,
जिसका बहाना लेकर ही रूठ जाऊँ।।

आँखों का सागर सुख गया है,
इन आँखों को कब तक मैं बहाऊँ।।

तू तो मेरे हाल में जीता था ना कभी,
अब बता मैं हाल अपना किसे बताऊँ।।

एक नज़्म और लिखना अपने इश्क़ पर,
मेरी कब्र पर आकर सुनाना जब मैं मर जाऊँ।।

तू अक्सर कहाँ करता था मुझे ज़िन्दगी अपनी,
जी करता है इसे हक़ीक़त मान कर सवँर जाऊँ।।

लोग तेरी लिखी किताबें पढ़ते है "चौहान",
मेरा मन है मैं तुझे पढ़ते-पढ़ते ही मर जाऊँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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