कितना अच्छा था ,
कितना प्यारा था,
मेरा बचपन।।
माँ झूला झुलाती थी,
लौरी गा के सुलाती थी,
सबकी आँखों का तारा था मैं,
शरारतें भी बहुत करता था मैं,
पापा की डाँट से बचा,माँ
आँचल में छुपाती थी,
बेफिक्री में था वो मेरा जीवन,
कुछ ऐसा था मेरा बचपन।।
रोता था जब माँ स्कूल छोड़ के जाती थी,
खिलौनों के लालच दे मन मेरा बहलाती थी,
रो पड़ता था फिर जब माँ याद आती थी,
खेलता था जहाँ याद आता है वो आँगन,
कुछ ऐसा था मेरा बचपन।।
रात को दादा दादी परियों की कहानी सुनाते थे,
सबका मैं खिलौना था, जो माँगू वो लाते थे,
वो ज़िंदगी तो हसीन नज़र आती थी,
खुशियों और बेफ़िक्री में था मेरा जीवन,
कुछ ऐसा था मेरा बचपन।।
किसी भी बात की ना कोई फ़िक्र सताती थी,
आज ज़िंदगी बोझ सी लगती है,
माथे पर सिकन हरपल रहती है,
एक अनजानी सी फ़िक्र सताती है,
कुछ लम्हात खुदा हँसी के ला दे,
हो सकता है तो फिर से बचपन लौटा दे।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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