Monday, 7 September 2020

"मुर्दा शायर" (MURDAA SHAYAR)



ये जहाँ इतना अच्छा नही है,
तुम जिसमें आना चाहते हो,
अभी उम्र भी है और काम भी,
क्यूँ इश्क़ के सागर में डूब जाना चाहते हो,
ये एक माया जाल ही तो है,
तुम क्यूँ इसमें फँस जाना चाहते हो,
अभी सब नया नया है तो अच्छा भी लगेगा,
क्यूँ इस रौशनी में रौशनी गवाना चाहते हो,
ये जो आज सावन की बारिश भा रही है तुम्हे,
ये कल तुम्हे झुलसा भी देंगी,
क्यूँ इस आग में खुद को जलाना चाहते हो,
ये हिदायतें भी है और मशवरा भी "चौहान",
जिसका अंज़ाम मौत के सिवा कुछ नही,
तुम क्यूँ उन रास्तों पर जाना चाहते हो,
जब तक टहनियों पर है तब तलक खुशबू है,
क्यूँ इस फूल को तोड़ कर मुरझाना चाहते हो,
ये रातें जागने के लिए नही है,
इनकी आगोश में सो जाय करो,
क्यूँ इन रातों को अश्क़ों से भिगोना चाहते हो,
इश्क़ के दर्द में आराम नही मिलता,
कल कभी ऐसा मंज़र हो जाये,
ढूंढते फ़िरो मारे मारे तुम मरहम इसका,
कहीं फिर ये ज़ख़्म नासूर ना हो जाये,
मैं खुद इस राह में आकर पछता रहा हूँ,
कभी ये भी हँसता खेलता आँगन था,
जिसे आज मैं ख्वाबों का श्मशान बता रहा हूँ,
ये चार दिवारी घर थी जिसमें अरमान पलते थे,
आज इस घर को खँडहर बता रहा हूँ,
नही चाहता कोई मौत को गले लगा ले मेरी तरह,
नही चाहता कोई ज़िंदगी से कायर हो जाये,
ये कलम ताज़ा रखती है ज़ख्मों को जज़्बातों को,
नही चाहता कोई टूट के बिखर जाए मेरी तरहा,
नही चाहता कहीं एक और मुर्दा शायर हो जाये।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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