बता देना मुझे ,
वैसे ये हर बार की कहानी है ,
बता देना ,
कब सड़कों पर उतरना है,
कब रोष में पुतले फूंकने है,
कब मोमबत्तियां मशाल जलानी है,
कब दोष देना है कपड़ो को,
कब तक ये पाबंदियाँ लगानी है,
कब तक इल्ज़ाम लगाना है दुसरो पर,
कब तक ये दरिंदगी छुपानी है,
बता देना मुझे,
कब तक यूँ अकेले नही घूमना है,
डरना है अकेले में,
बाहर घर से अकेले नही निकलना है,
कब तक ये भेड़िये शरेआम रहेंगें,
कब तक हम यूँ बेज़ुबान रहंगे,
कब चलानी है कलम "चौहान" को,
कब तक इस मुद्दे पर आवाज उठानी है,
कब तक ये असमते युहीं लुटती रहेंगी,
कब तक बेटियाँ युहीं घुटती रहेंगी,
कब तक यूँ लिख कर कोशिश करनी है,
क्या बदल पाएगी सोच जमाने की,
चलो तुम बता देना,
कब ये कहानी फिर दोहरानी है।।
शुभम् सिंह चौहान,
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

😞🙏 no word ....
ReplyDelete😊😊😊
DeleteJb tk system thik nhi hota tab tk yehi chalega
ReplyDeleteHaan bhai😊😊
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