वो खुद राह से भटक गया,
राह दूसरों को दिखाते-दिखाते।।
खुद को ही जला बैठा आज,
आग दूसरों की बुझाते-बुझाते।।
आज खुद गलती कर गया क्यूँ,
दुसरो को समझते- समझाते।।
खुद ही दूर कर गया खुद को,
सपनों को करीब लाते- लाते।।
मैं खुद बेज़ुबान हो गया आज,
नाम तेरा चिल्लाते- चिल्लाते।।
खुद ही रिश्ते तोड़ गया सब ,
रिश्तों को निभाते-निभाते।।
एक ज़िंदगी तमाशा बन गयी मेरी,
ख्वाबो को हकीकत बनाते-बनाते।।
मैं खुद मुश्किलों से हार गया आज,
जमाने को हौसला दिलाते - दिलाते।।
नाव ज़िंदगी की आख़िर डूब गई,
लहरों का साथ निभाते-निभाते।।
ना जाने कब ये गहरी नींद आ गयी,
तुझको बाहों में अपनी सुलाते-सुलाते।।
मिट्टी भी देखो आज रो पड़ी "चौहान",
मुझको अपनी आगोश में लाते-लाते।।
कागज़ भीग गया स्याही सुख गयी,
मेरी कलम को ज़ुबाँ दिल की बनाते बनाते।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No words 🙏
ReplyDeleteThanks ♥️♥️
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