कैसी है वो तेरी नई दुनिया,
नया शहर, नया घर,
ऐसा क्या रास आ गया वहाँ,
जो तू अब तलक लौट के ना आया...
जानता है परिंदे उड़ते है दिनभर आसमाँ में,
पर रात होते ही अपने आह्लने मे लौट आते है,
चल माना तू परिंद जात ही सही,
पर इतना तो बता वो आहलना कहाँ बना आया...
रुक तो मौसम भी बदलते है कई दफा,
पर ऐसा कौन सा मौसम है जो लौट कर ना आया,
कोई नाराज़गी है तो रख बेशक,
पर ऐसा कौन है बता जो बिन बात,
नया बसेरा बना आया...
आजा हाल यहाँ का बताता हूँ,
कौन कैसा है तेरे बिन सब दिखता हूँ,
कोई तुझे याद कर रो लेता है,
कोई तुझे याद कर खामोशी से सह लेता है,
कुछ ने भुला दिया तुझे मर्ज़ी खुदा की समझ,
कोई तेरी तस्वीरों से बात कर मन बहला लेता है,
हाँ संभाल तो लेगा हर कोई तेरे बिन भी,
पर इतना आसान कहाँ है,
जो हर राज़ बोलकर बता देता था,
आज वो "चौहान" भी कहाँ है,
इतना पत्थरदिल तो नही था तु,
क्या किसी के हाल पर तरस ना आया,
ऐसा क्या रास आ गया वहाँ,
जो तू अब तलक लौट के ना आया...
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Jaan.....��
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