Friday, 24 July 2020

"हो नही सकता" (HO NHI SAKTA)



अब कागज़ पर नही कलम से पानी पर लिखना है,
बिना पँख इस आसमाँ की ऊंचाइयों में उडना है,
नंगे पैर अब जलते-सुलगते अंगारो पर चलना है,
नापना है अब इस गहरे सागर की गहराई को,
जो हो नही सकता "चौहान"अब वही तो करना है।।
वो दूर से मिलते नज़र आते है अम्बर और ज़मी,
आज उनको हकीकत में एक करना है,
ये हवायें जो छू कर गुज़र रही है मुझे यहाँ,
आज इनको अपनी आगोश में करना है,
फिसल जाता है ये रेत बारहां मुट्ठी से मेरी,
आज इसको बंद मुट्ठी में करना है,
अब नही रुकना इन राहों में इतना आगे आकर,
अब वक्त को वक़्त से पीछे करना है,
नही जानता कौन कितने पानी मे है यहाँ "चौहान",
आज खुद को खुद से बेहतर करना है,
मिट्टी पे मिट्टी हर कोई लिख देगा,
आज पानी पर पानी लिखना है,
जो हो नही सकता "चौहान"अब वही तो करना है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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