काश कहीं ऐसा होता,
सब कुछ नही मगर,
कुछ तो मेरे हाथों में होता,
बदल देता मैं भी आखिर,
कुछ पन्ने वक़्त की किताब के,
कुछ संजो के रखता,
कुछ जला के राख कर देता,
कुछ खुशियाँ डाल देता झोली में तेरी,
कुछ गम तेरे अपने नाम कर लेता,
काश कहीं ऐसा होता,
काश के समझ पाता,
खेल तकदीरों का,
नसीबों का हाथों की लकीरों का,
अपने हिस्से के कुछ लम्हे निकाल लेता,
और चुपके से कहीं तेरे दामन में डाल देता,
क्या कुछ तो नही था मेरे ख़ातिर तू,
उठता कलम फिर "चौहान",
ये हसीन सुबह तेरे,
और ये काली अंधेरी रात,
नाम खुद के लिख लेता,
काश कहीं ऐसा होता।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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