क्या हुआ अगर फासले ही फासले मिले,
रास्ते तो हमको भी तुम्हारे जैसे ही मिले।।
क्या हुआ अगर सावन की बारिश ना आयी,
हमको भी राहो में मौसम पतझड़ के मिले।।
महकता गुलाब था उसके गुलिस्तां का मैं,
मुझे तोड़ने वाले हाथ मेरे अपनो के मिले।।
कहाँ कोई ख़्वाब आकर बस जाता आँखों मे मेरी,
इन आँखों मे तो हमेशा गहरे समुन्दर ही मिले।।
बड़ी मुहोब्बत से गले से लगाया था उसने हमें,
पीठ में खंज़र घोपने वाले हाथ उसके ही मिले।।
वो जिसकी साँसे चलती थी नाम पर हमारे,
आज वो गैरो की आगोश में लिपटे हुए मिले।।
हाँ गुलाब ही तो थे वो "चौहान" इस बगिया के,
वो अलग बात है हमारे हिस्से में कांटे ही मिले।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
पहचान खुद-ब-खुद हो जायेगी तेरी मुझसे, कभी मेरे नज़रिए से मुझे पढ़ के तो देख!!
Sunday, 19 July 2020
"रास्ते" (RAASTE)
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